मुजफ्फरपुर की शाही लीची और गया के बोधिवृक्ष के बाद अब वीर कुंवर सिंह — कबाड़ से बिहार की पहचान गढ़ रहा यह इंजीनियर जीवनशैली 13 घंटे पहले 1
भोजपुर के युवा इंजीनियर प्रशांत कुमार 'वेस्ट टू वंडर' थीम पर कबाड़ से बिहार की सांस्कृतिक धरोहरों की भव्य कलाकृतियां तैयार कर रहे हैं और इस पहल से 15 से अधिक स्थानीय युवाओं को रोजगार भी मिल रहा है।

बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक धरोहरों और स्थानीय पहचान को आधुनिक कला की भाषा में पिरोने का काम भोजपुर के एक युवा इंजीनियर प्रशांत कुमार बखूबी कर रहे हैं। उनकी सबसे खास बात यह है कि वे किसी महंगे संसाधन के बजाय बेकार पड़ी स्क्रैप यानी कबाड़ सामग्री से बेमिसाल कलाकृतियां तैयार करते हैं। उनकी इस रचनात्मक सोच ने तकनीक के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और रोजगार सृजन की एक नई मिसाल खड़ी कर दी है।

पानी में तैरने वाली नाव से शुरू हुआ सफर

इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि से आने वाले प्रशांत ने पहली बार उस समय पूरे राज्य का ध्यान अपनी ओर खींचा था, जब उन्होंने पानी में तैरने वाली एक अनोखी नाव बनाई थी। इसके बाद उन्होंने 'वेस्ट टू वंडर' की थीम पर काम करते हुए स्क्रैप सामग्री से कई ऐसे शानदार मॉडल और प्रतिमाएं तैयार कीं, जिन्होंने बिहार के अलग-अलग जिलों की पहचान को एक कलात्मक और नया रूप दिया।

मुजफ्फरपुर की शाही लीची से गया के बोधिवृक्ष तक

मुजफ्फरपुर के चौक-चौराहों पर उन्होंने विश्व प्रसिद्ध शाही लीची की बेहद खूबसूरत और विशाल स्क्रैप कलाकृति स्थापित कर उसे एक नई पहचान दी। ज्ञान की भूमि गया में उन्होंने बोधिवृक्ष की एक अद्भुत और कलात्मक प्रस्तुति तैयार कर लोगों का मन मोह लिया। अब अपने गृह जिले भोजपुर में उन्होंने 1857 की क्रांति के महानायक बाबू वीर कुंवर सिंह की वीरता और स्वाभिमान को स्क्रैप आर्ट के जरिए जीवंत कर दिखाया है।

विदेशी अनुभव को बिहार की मिट्टी पर उतारा

प्रशांत का अनुभव सिर्फ बिहार या देश तक सीमित नहीं है। वे अपने विदेशी मित्रों के साथ दुनिया के कई देशों का भ्रमण कर चुके हैं और इस दौरान उन्होंने सार्वजनिक कला, शहरी सौंदर्यीकरण और सांस्कृतिक प्रतीकों के संरक्षण के तौर-तरीकों को बेहद करीब से देखा। अब वे उन्हीं अंतरराष्ट्रीय अनुभवों को बिहार की धरती पर उतारने में जुटे हैं, ताकि स्थानीय पहचान को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया जा सके।

कला के साथ रोजगार: 15 युवाओं को स्थायी काम

प्रशांत का यह मिशन केवल कला और शौक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थानीय स्तर पर रोजगार का भी एक बड़ा जरिया बन चुका है। फिलहाल उनकी टीम में करीब 15 लोग स्थायी रूप से जुड़े हुए हैं, जिनमें प्रोफेशनल डिजाइनर, वेल्डर, मूर्तिकार, चित्रकार और कम्युनिकेशन एक्सपर्ट शामिल हैं। कबाड़ को कलाकृति में बदलने की इस अनूठी प्रक्रिया ने कई हुनरमंद युवाओं को रोजगार के साथ-साथ अपनी प्रतिभा दिखाने का बड़ा मंच भी दिया है।

प्रशासन का मिल रहा भरपूर सहयोग

प्रशांत बताते हैं कि उनका सपना है कि जब भी हस्तनिर्मित कलाकृतियों और रचनात्मक नवाचार की चर्चा हो, तो पूरी दुनिया में सबसे पहले बिहार का नाम लोगों की जुबान पर आए। उनकी इस दूरदर्शी सोच को धरातल पर उतारने में विभिन्न जिलों के जिलाधिकारियों का भी भरपूर सहयोग और सराहना मिल रही है। प्रशासन और आम जनता, दोनों के साथ से प्रशांत आज महज एक इंजीनियर नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक पहचान, पर्यावरण संरक्षण और रोजगार को एक सूत्र में पिरोने वाले युवा रोल मॉडल के रूप में उभर रहे हैं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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