बिहार
2 घंटे पहले
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रासायनिक खादों के लगातार और अंधाधुंध इस्तेमाल से खेतों की उपजाऊ क्षमता दिन-ब-दिन घटती जा रही है और यही बात किसानों के लिए सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है। ऐसे हालात में ढैंचा की खेती मिट्टी के लिए एक बेहतरीन बूस्टर डोज़ की तरह काम करती है। हरी खाद के रूप में इसे उगाने से खेत में भारी मात्रा में प्राकृतिक नाइट्रोजन जुड़ता है और भूमि की उर्वरकता बढ़ जाती है।
खेत में ही पलटी जाती है फसल
इस तकनीक की सबसे खास बात यह है कि फसल तैयार होने के बाद उसे काटा नहीं जाता, बल्कि खेत में ही ट्रैक्टर चलाकर वहीं पलट दिया जाता है, यानी पूरी हरी फसल मिट्टी में मिला दी जाती है। यह अनोखा तरीका मिट्टी की सेहत को पूरी तरह दुरुस्त कर देता है और खेत को इतने प्राकृतिक पोषक तत्व मिल जाते हैं कि बंजर जमीन भी सोना उगलने लगती है।
गया के किसान का अनुभव
बिहार के गया जिले के बगदाहा गांव के प्रगतिशील किसान श्रीनिवास कुमार ने करीब 4 एकड़ में ढैंचा की खेती की है। श्रीनिवास पिछले पांच साल से इसकी खेती कर रहे हैं और बीज उत्पादन के साथ-साथ इसका इस्तेमाल हरी खाद के रूप में भी कर रहे हैं।
उनका कहना है कि जब इस फसल को खेत में ही सड़ाया जाता है तो मिट्टी को भारी मात्रा में नाइट्रोजन और ऑर्गेनिक कार्बन मिलता है। इससे जमीन की नमी सोखने की क्षमता काफी बढ़ जाती है और मिट्टी एकदम भुरभुरी हो जाती है।
आधी हो जाती है खेती की लागत
इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि अगली मुख्य फसल जैसे धान या गेहूं की बुवाई के समय बाजार से महंगे यूरिया और डीएपी खाद खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे खेती की लागत सीधे आधी रह जाती है।
कम पानी और कम मेहनत में तैयार
ढैंचा की एक बड़ी खूबी यह है कि इसे उगाने में न तो ज्यादा पानी खर्च होता है और न ही किसी खास मेहनत की जरूरत पड़ती है। इसे आमतौर पर अप्रैल से जून के महीने में खाली खेतों में बोया जाता है और यह महज 40 से 50 दिनों में अच्छी-खासी ऊंचाई तक तैयार हो जाती है। जैसे ही फसल में फूल आने शुरू होते हैं, ठीक उसी समय खेत में रोटावेटर चलाकर इसे मिट्टी में दबा दिया जाता है। पानी के संपर्क में आते ही यह हरी फसल खेत के अंदर ही सड़कर बेहतरीन कंपोस्ट खाद में बदल जाती है।
मिट्टी की संरचना भी सुधरती है
किसान श्रीनिवास के मुताबिक ढैंचा एक हरी खाद वाली फसल है, जो वातावरण में मौजूद नाइट्रोजन को अपनी जड़ों के जरिए मिट्टी में स्थिर करने का काम करती है। इससे खेत में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधियां तेज होती हैं और पौधों को पोषक तत्व बेहतर ढंग से मिल पाते हैं। यह न सिर्फ मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन बढ़ाती है, बल्कि मिट्टी की संरचना में सुधार लाती है और उसकी जलधारण क्षमता को भी बढ़ा देती है।
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