विश्व
5 घंटे पहले
2
विचारों
ईरान युद्ध के असर से दुनिया के तमाम देशों की अर्थव्यवस्थाएं दबाव में आ गई हैं। तेल के लगातार चढ़ते दामों ने कई देशों को आर्थिक संकट में धकेल दिया है और उनकी विदेशी मुद्रा का भंडार घटता जा रहा है। यही वजह है कि कुछ देशों को मजबूरन अपना गोल्ड रिजर्व अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचना पड़ा। पर सवाल यह है कि इस कठिन दौर में भी आखिर कौन से देश सोना खरीद रहे हैं।
जब कई देश अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए अपना गोल्ड रिजर्व बेच रहे हैं, तो इस सोने को खरीदने वालों में दो नाम सबसे ज्यादा उभर कर सामने आते हैं। पहला है चीन, जो धुआंधार रफ्तार से सोना खरीद रहा है। दूसरा एक ऐसा देश है, जो भारत से दस गुना छोटा है और जिसकी आबादी महज 4 करोड़ है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक तुर्की, रूस और अजरबैजान ने अपना सोना बेचा है।
वो छोटा देश कौन है
दुनिया से बड़े पैमाने पर सोना खरीदने वाला यह छोटा देश पोलैंड है, जो यूरोप की दमदार अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। पोलैंड ने 2026 की पहली तिमाही में ही 48.6 टन सोना खरीद लिया। यह वही देश है, जिसकी हालत दूसरे विश्व युद्ध में बेहद खराब हो गई थी और वहां के लोगों को बहुत बुरे दिन देखने पड़े थे। इसकी आबादी मुश्किल से 4 करोड़ है और क्षेत्रफल के लिहाज से भी यह भारत के मुकाबले बहुत छोटा है।
ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि क्या पोलैंड की अर्थव्यवस्था इतनी ताकतवर है कि वह दुनिया में सबसे ज्यादा सोना खरीद सके। इसका सीधा जवाब है – हां, वह ऐसा कर सकता है और आगे भी करता रहेगा।
मजबूत और स्थिर अर्थव्यवस्था
पोलैंड की अर्थव्यवस्था सचमुच काफी मजबूत और स्थिर है। उसने विदेशी मुद्रा का बड़ा भंडार बना रखा है, जिसे वह धीरे-धीरे सोने में बदल रहा है। यह यूरोप की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जो मजबूत घरेलू मांग और यूरोपीय संघ के फंड से होने वाले निवेश के दम पर अच्छी स्थिति में है। एक स्थिर और बढ़ती अर्थव्यवस्था ही किसी देश को सोने जैसी रणनीतिक परिसंपत्ति बड़े स्तर पर खरीदने की ताकत देती है।
पोलैंड के पास कुल विदेशी मुद्रा भंडार 243.5 बिलियन डॉलर से अधिक है। यही विशाल भंडार उसकी असली ताकत है। लेकिन सवाल यह भी है कि यह देश अचानक अपना गोल्ड रिजर्व इतनी तेजी से क्यों बढ़ा रहा है।
हाथ में सोना, हाथ में सुरक्षा
पोलैंड का इतिहास बेहद कठोर रहा है। दूसरे विश्व युद्ध में उसे अपना सोना बचाने के लिए देश-देश भटकना पड़ा था। इसी पीड़ादायक अनुभव से “हाथ में सोना, हाथ में सुरक्षा” की सोच ने जन्म लिया। पोलैंड यूक्रेन के ठीक बगल में स्थित है और रूस के साथ तनाव को देखते हुए सोना उसके लिए भू-राजनीतिक जोखिमों से बचाव का सबसे भरोसेमंद साधन है। साथ ही वह डॉलर पर अपनी निर्भरता भी कम करना चाहता है।
फिलहाल पोलैंड के पास सोने का भंडार भारत से कम ही है। उसके पास 581.6 टन सोना है, जो दुनिया का 13वां सबसे बड़ा भंडार है, जबकि भारत के पास कुल 880.5 टन गोल्ड रिजर्व है यानी दुनिया का 9वां सबसे बड़ा भंडार। हालांकि पोलैंड इस समय तेज रफ्तार से खरीदारी कर रहा है और अपने गोल्ड रिजर्व को 770 टन तक ले जाना चाहता है।
देश अपना सोना कब बेचते हैं
जब किसी देश के पास नकदी की कमी हो जाती है, तो सोना सबसे तेजी से भुनाया जाने वाला एसेट साबित होता है। रूस ने अपने बढ़ते बजट घाटे को पाटने के लिए सोना बेचा, जबकि तुर्की ने ऊर्जा आयात के लिए डॉलर जुटाने हेतु इसका सहारा लिया। तुर्की जैसे देशों के लिए सोने की बिक्री अपनी घरेलू मुद्रा के मूल्य को गिरने से बचाने का भी एक उपाय है।
पोलैंड की मजबूती के आधार
- डिफेंस, ग्रीन एनर्जी, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और परिवहन इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश।
- लगातार ऊंची जीडीपी वृद्धि दर और मजबूत घरेलू मांग।
- रक्षा खर्च में बढ़ोतरी और अत्याधुनिक हथियारों की खरीद से सैन्य शक्ति बढ़ी, जिससे निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ।
- यूरोपीय यूनियन में महत्वपूर्ण उत्पादन केंद्र, खासकर मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र में।
- पूर्वी यूरोप में नाटो की “फ्रंट लाइन” पर होने के बावजूद स्थिरता बनाए रखी।
चीन क्यों जमा कर रहा सोना
चीन लगातार सोना खरीद रहा है, क्योंकि वह अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता घटाना चाहता है। वह भू-राजनीतिक और आर्थिक सुरक्षा के लिए सोने को एक रणनीतिक हथियार बना रहा है। चीन का लक्ष्य 5,000 टन गोल्ड रिजर्व का है, जबकि फिलहाल उसके पास 2,305 टन सोना है। माना जा रहा है कि हाल ही में उसने 240 टन सोना खरीदा है और वह गुपचुप तरीके से इसका भंडार बढ़ा रहा है।
ये दो छोटे देश क्यों खरीद रहे सोना
उज़्बेकिस्तान ने इस साल की पहली तिमाही में अंतरराष्ट्रीय बाजार से 16 टन से ज्यादा सोना खरीदा है, तो कजाकिस्तान पिछले 16 महीने से लगातार सोने की खरीदारी कर रहा है। इनके अलावा चेक गणराज्य, चीन, मलेशिया, कंबोडिया, इंडोनेशिया, सर्बिया और ग्वाटेमाला जैसे देश भी इस दौरान सोना खरीद रहे हैं। उज़्बेकिस्तान अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने और अपनी मुद्रा को स्थिर रखने के लिए ऐसा कर रहा है।
पहली नजर में उज़्बेकिस्तान और कजाकिस्तान जैसे छोटे देशों का बड़े पैमाने पर सोना खरीदना हैरान कर सकता है, लेकिन इसके पीछे एक ठोस और अनोखी रणनीति है। दरअसल ये दोनों देश दुनिया के प्रमुख सोना उत्पादकों में हैं और सालाना सैकड़ों टन सोने का खनन करते हैं। उज़्बेकिस्तान की मुरुंताऊ खदान दुनिया की सबसे बड़ी सोने की खदानों में से एक है। कजाकिस्तान ने 2026 की पहली तिमाही में ही करीब 13 टन रिफाइंड सोने का उत्पादन किया।
इसका मतलब है कि भंडार भरने के लिए उनके पास सोने की अपनी ही “छपाई मशीन” मौजूद है। इन देशों ने कानूनी व्यवस्था इस तरह बनाई है कि वहां निकलने वाला सोना पहले अनिवार्य रूप से उनके केंद्रीय बैंक को बेचा जाए और बैंक के पास इसे खरीदने का पहला अधिकार होता है।
कब से देश रखने लगे गोल्ड रिजर्व
दुनिया में देशों ने सोने का भंडार रखने की प्रथा सदियों पहले शुरू कर दी थी, लेकिन औपचारिक तौर पर केंद्रीय बैंकों द्वारा गोल्ड रिजर्व रखने का सिस्टम 1994 में ब्रेटन-वुड्स गोल्ड स्टैंडर्ड सिस्टम के साथ आया। ब्रेटन-वुड्स गोल्ड स्टैंडर्ड सिस्टम दरअसल 1944 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाई गई अंतरराष्ट्रीय मुद्रा प्रणाली थी, जिसका मकसद वैश्विक व्यापार और मुद्राओं को स्थिरता देना था। इस प्रणाली के खत्म होने के बाद भी दुनिया के केंद्रीय बैंक अपने फॉरेक्स रिजर्व में सोने को कुछ जगह देते आए हैं, क्योंकि सोना आज भी दुनिया की सबसे विश्वसनीय संपत्ति मानी जाती है।
Comments
0 comment