Coffee Par Kurukshetra: टीएमसी में सेंध के बाद क्या अगला नंबर महाराष्ट्र का? जानें पूरी चर्चा भारत 5 दिन पहले 15
तृणमूल कांग्रेस में पड़ी फूट को लेकर हुई विस्तृत चर्चा में दावा किया गया कि यह घटनाक्रम पहले से तैयार रणनीति का हिस्सा था। इसे महज दलबदल नहीं, बल्कि 'प्रोजेक्ट लोटस' के रूप में देखा जा रहा है।

काफी पहले से बन रही थी जमीन

चर्चा में यह बात उभरकर सामने आई कि यह पूरा घटनाक्रम किसी अचानक लिए गए फैसले का नतीजा नहीं है, बल्कि इसकी पटकथा लंबे समय से तैयार हो रही थी। तृणमूल कांग्रेस के कई सांसद अरसे से पार्टी से नाराज चल रहे थे और बताया जा रहा है कि वे भाजपा नेताओं के लगातार संपर्क में बने हुए थे। इस सिलसिले में भाजपा के वरिष्ठ नेता भूपेंद्र यादव की भूमिका को खासतौर पर रेखांकित किया गया। बताया गया कि दिल्ली में उनके आवास पर कई अहम बैठकें आयोजित की गईं, जिनमें टीएमसी के असंतुष्ट सांसदों के साथ-साथ पश्चिम बंगाल के नेता शुभेंदु अधिकारी भी मौजूद रहे।

आखिर भाजपा के बजाय किसी और दल में क्यों गए नेता?

राजनीतिक जानकारों की मानें तो भाजपा का असल मकसद इन सांसदों को सीधे अपने पाले में लाना नहीं था, बल्कि संसद के भीतर अपनी संख्या को मजबूत करना था। महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे अहम विधेयकों को पारित कराने के लिहाज से अतिरिक्त समर्थन जुटाने की रणनीति के तहत इस कदम को देखा जा रहा है। यही वजह रही कि सांसदों को भाजपा में शामिल कराने के बजाय एक अलग दल में विलय का रास्ता अपनाया गया।

तेज हुई कानूनी बहस

इस घटनाक्रम के साथ-साथ कानूनी स्तर पर भी बहस गरमा गई है। दलबदल कानून और संविधान की दसवीं अनुसूची के दायरे में इस कदम की वैधता को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं। एक धड़े का तर्क है कि संसदीय दल के दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरे दल में विलय कर सकते हैं, वहीं दूसरे पक्ष का मानना है कि यह मसला अदालत तक पहुंचेगा और एक लंबी कानूनी लड़ाई की वजह बन सकता है। चर्चा के दौरान अरुणाचल प्रदेश और गोवा के पुराने राजनीतिक प्रसंगों का भी जिक्र हुआ, जहां बड़े पैमाने पर विधायकों के दलबदल या विलय की घटनाएं देखी गई थीं। इन्हीं मिसालों के आधार पर कुछ विशेषज्ञ यह मानते हैं कि मौजूदा घटनाक्रम भी संवैधानिक प्रावधानों के घेरे में रह सकता है।

शुभेंदु और निशिकांत की अहम भूमिका

इस समूचे प्रकरण में शुभेंदु अधिकारी, निशिकांत दुबे और कुछ अन्य नेताओं की भूमिका को भी निर्णायक बताया गया। कहा गया कि टीएमसी के अंदर लंबे अरसे से पनप रहे असंतोष को भांपने और उसे एक राजनीतिक स्वरूप देने में इन नेताओं ने सक्रिय हिस्सेदारी निभाई। फिलहाल इतना साफ है कि यह मामला सिर्फ सांसदों के दल बदलने तक सीमित नहीं है। इसके राजनीतिक, कानूनी और संसदीय असर आने वाले दिनों में और खुलकर सामने आएंगे। यही कारण है कि इसे केवल एक राजनीतिक ऑपरेशन के तौर पर नहीं, बल्कि “प्रोजेक्ट लोटस” के रूप में देखा जा रहा है, जिसकी आगे की कड़ियों पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं।

चेतन शुक्ला
Official Verified Account

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

आपकी प्रतिक्रिया?


आपको यह भी पसंद आ सकता हैं

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!