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3 घंटे पहले
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चीन ने किया नए वैश्विक संगठन का ऐलान
फ्रांस में दुनिया के सबसे अमीर देशों के संगठन G7 की महा-बैठक का मंच सजा, लेकिन इसमें चीन को न्योता नहीं भेजा गया। इसी बात से बीजिंग बुरी तरह तिलमिला उठा है। शी जिनपिंग ने चुप बैठने के बजाय अमेरिका और उसके धनी सहयोगी देशों को पीछे छोड़ने के इरादे से एक बड़ा कदम उठा दिया। जैसे ही जी-7 समिट समाप्त हुआ, चीन ने घोषणा कर दी कि वह अपना एक अलग वैश्विक समूह खड़ा करने जा रहा है, जिसका नाम 'ग्लोबल एआई को-ऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन' रखा गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस नए ग्रुप में जिनपिंग किन देशों को जोड़ना चाहते हैं और इसके पीछे असल मंशा क्या है।
आखिर क्या है चीन की रणनीति?
चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने दुनिया भर के पत्रकारों के सामने साफ कर दिया कि चीन अब वैश्विक नेतृत्व अपने हाथ में लेने की तैयारी में है और Global AI Cooperation Organization के जरिए वह कई देशों को साथ लेकर एक अलग समूह बनाना चाहता है। जी-7 की बैठक से बाहर रखे जाने के बाद बीजिंग यह अच्छी तरह समझ चुका है कि अमेरिका और यूरोपीय देश उसे आगे बढ़ने का मौका नहीं देंगे। यही वजह है कि वांग यी ने दो-टूक कहा कि चीन इस नए संगठन को तेजी से खड़ा कर रहा है और इसमें शामिल होने के लिए सभी देशों का स्वागत है।
किन देशों को साथ जोड़ना चाहता है चीन
चीन की निगाहें खास तौर पर तीन तरह के देशों पर टिकी हैं, जिन्हें वह इस नए मोर्चे में शामिल करना चाहता है।
- ग्लोबल साउथ के देश: चीन का सबसे बड़ा दांव एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में फैले विकसित और विकासशील देशों पर है। इन देशों को अक्सर पश्चिमी देशों के भरोसे छोड़ दिया जाता है और अब चीन तकनीक का लालच देकर इन्हें अपने पाले में लाना चाहता है।
- ब्रिक्स और एससीओ के साथी: चीन के शीर्ष आर्थिक नीति-निर्माता झाओ हैबिंग ने स्पष्ट किया कि बीजिंग इस नए ग्रुप को मजबूत बनाने के लिए ब्रिक्स (BRICS) देशों और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के मंच का पूरा इस्तेमाल करेगा। इसका मतलब है कि इस समूह में रूस और ईरान जैसे देश भी अहम भूमिका में नजर आएंगे।
- अमेरिका से नाराज देश: जो देश अमेरिकी प्रतिबंधों या उसके दबदबे से परेशान हैं, उन्हें चीन इस एआई समूह में आने का खुला न्योता दे रहा है, ताकि अमेरिका के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा तैयार किया जा सके।
अमेरिका के 'सीक्रेट एआई प्लान' से भड़का बीजिंग
चीन की इस नाराजगी और अचानक की गई इस घोषणा के पीछे असल में अमेरिका की एक गोपनीय रिपोर्ट है, जिसने बीजिंग के होश उड़ा दिए। जी-7 समिट के दौरान एक खुफिया कूटनीतिक रिपोर्ट लीक हुई, जिससे पता चला कि अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा, इटली और जापान मिलकर एक बड़ी रणनीति पर काम कर रहे हैं।
इस योजना के तहत अमेरिका में बने सुपर-एडवांस्ड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मॉडल्स तक पहुंच सिर्फ चुनिंदा 'भरोसेमंद पार्टनर्स' को ही दी जाएगी। यानी अमेरिका कूटनीतिक स्तर पर दुनिया को दो हिस्सों में बांटना चाहता है, जहां सबसे बेहतरीन तकनीक पर सिर्फ पश्चिमी देशों और उनके करीबियों का कब्जा रहेगा। जब यह बात जी-7 के बंद कमरों से बाहर आई, तो चीन का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और उसने तुरंत अपना अलग ग्रुप बनाने का फैसला कर लिया।
अमेरिका के 'अहंकार' पर चीन का पलटवार
इस बार चीन ने अमेरिका पर निशाना साधने के लिए बहुत ही सोची-समझी रणनीति अपनाई है और उसकी सबसे कमजोर नस — 'पैसा और पाबंदी' — पर हाथ रख दिया है। चीन ने ग्लोबल गवर्नेंस पर एक व्हाइटपेपर जारी किया, जिसमें अमेरिका के रवैये को 'मनमानी करने वाला, मतलबी और सब कुछ अपनी मुट्ठी में रखने वाला' बताया गया। अमेरिका को टक्कर देने के लिए चीन ने जो नया फॉर्मूला निकाला है, उसके मुख्य बिंदु ये हैं।
- सब्सक्रिप्शन बनाम फ्री सर्विस: अमेरिका के बड़े और ताकतवर एआई मॉडल्स बेहद महंगे हैं और इनके लिए भारी सब्सक्रिप्शन फीस चुकानी पड़ती है। इसके उलट, चीन दुनिया को बिल्कुल मुफ्त या बेहद सस्ते एआई मॉडल्स दे रहा है, जिन्हें पूरी तरह डाउनलोड किया जा सकता है।
- टेक्नोलॉजी और टैलेंट ट्रांसफर: चीन ने 'AI कैपेसिटी बिल्डिंग फॉर ऑल' नाम की एक नई मुहिम शुरू की है, जिसके जरिए वह गरीब और विकासशील देशों को न सिर्फ अपनी तकनीक देगा, बल्कि वहां के लोगों को ट्रेनिंग भी देगा।
- संयुक्त राष्ट्र का समर्थन: चीन दिखावे के तौर पर संयुक्त राष्ट्र (UN) को आगे रख रहा है, ताकि दुनिया को यह भरोसा दिलाया जा सके कि उसका समूह नियमों और मानव हित के लिए काम करेगा।
ट्रंप के 'AI एक्शन प्लान' से शुरू हुई थी जंग
यह पहली बार नहीं है जब दोनों महाशक्तियां इस मुद्दे पर आमने-सामने आई हैं। दरअसल, इस टकराव की नींव कुछ समय पहले ही पड़ गई थी, जब ट्रंप प्रशासन ने विदेशों में अमेरिकी तकनीक और एआई का दबदबा बढ़ाने के लिए एक आक्रामक 'एआई एक्शन प्लान' का ऐलान किया था। ट्रंप के इस कदम के तुरंत बाद चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग ने शंघाई में एक बड़ी कॉन्फ्रेंस के दौरान साफ कर दिया था कि चीन चुप नहीं बैठेगा और एक अलग अंतरराष्ट्रीय संगठन बनाकर रहेगा।
हालांकि पिछले महीने भारत, अमेरिका और चीन ने मिलकर एआई सिक्योरिटी को लेकर कुछ बुनियादी नियम बनाने पर सहमति जताई थी, लेकिन जी-7 के इस ताजा घटनाक्रम ने उस पूरी बातचीत पर पानी फेर दिया है। अब यह साफ हो चुका है कि आने वाले दिनों में दुनिया केवल हथियारों या व्यापार के मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि एआई तकनीक के मोर्चे पर भी एक नए 'कोल्ड वॉर' की गवाह बनने जा रही है। अब देखना यह होगा कि जिनपिंग के इस न्योते को कितने देश स्वीकार करते हैं और अमेरिका इस चीनी घेराबंदी को तोड़ने के लिए कौन-सा नया दांव चलता है।
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