करियर
13 घंटे पहले
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विचारों
कहा जाता है कि अगर पूरी निष्ठा और मेहनत से प्रयास किया जाए तो सफलता खुद-ब-खुद कदमों में आ जाती है। कुछ ऐसी ही कहानी है कन्नौज जिले में समाज कल्याण अधिकारी के पद पर तैनात वेद प्रकाश मिश्र की, जिन्होंने बिल्कुल शून्य से शुरुआत कर आज यह मुकाम पाया है। एक साधारण किसान परिवार से प्रशासनिक सेवा तक का उनका सफर उन तमाम युवाओं के लिए मिसाल है, जो कम समय में बड़ी कामयाबी पाने की होड़ में अक्सर रास्ता भटक जाते हैं।
उनका जीवन सिखाता है कि सफलता तक पहुंचने का मार्ग धैर्य, परिश्रम और सही दिशा से होकर गुजरता है।
पिता का सपना और परिवार की पृष्ठभूमि
वेद प्रकाश मिश्र के पिता सत्य प्रकाश मिश्र एक साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखते थे। पढ़ाई में गहरी रुचि होने के कारण उन्होंने अधिवक्ता बनने का सपना संजोया और कानून की पढ़ाई भी पूरी की, लेकिन वकालत के क्षेत्र में उन्हें मनचाही सफलता हाथ नहीं लगी। इसके बाद उन्होंने खेती और छोटी-मोटी नौकरियों के सहारे अपने परिवार का भरण-पोषण किया।
मऊनाथ भंजन में जन्म और शुरुआती पढ़ाई
वेद प्रकाश मिश्र का जन्म 1 जनवरी 1989 को पूर्वांचल के मऊनाथ भंजन जिले में हुआ। तीन भाइयों और दो बहनों में वे सबसे छोटे हैं। उनकी आरंभिक शिक्षा मऊ के विद्या मंदिर में हुई, जहां उन्होंने कक्षा तीन तक पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने एक बौद्ध विद्यालय से आगे की पढ़ाई पूरी की। सीमित संसाधनों के बावजूद उनके परिवार ने शिक्षा को हमेशा सबसे ऊपर रखा।
आर्थिक तंगी के बीच पढ़ाई का जुनून
एक दौर ऐसा भी आया जब परिवार को आर्थिक कठिनाइयों से जूझना पड़ा। वेद प्रकाश मिश्र उसी विद्यालय में पढ़ते थे, जहां उनके पिता नौकरी करते थे। उस समय स्कूल की फीस महज 40 रुपये हुआ करती थी और पिता का वेतन भी बेहद कम था। फिर भी उन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ी। आगे की शिक्षा के लिए वेद प्रकाश मिश्र इलाहाबाद चले गए, जहां उन्होंने अपने सपनों को साकार करने की नींव रखी।
सिविल सेवा की तैयारी और युवाओं के नाम संदेश
सिविल सेवा की तैयारी के दौरान वेद प्रकाश मिश्र ने कड़ी मेहनत और अनुशासन को अपना मूल मंत्र बनाया। उनका मानना है कि आज का युवा बहुत जल्दी सफलता पाना चाहता है और इसी हड़बड़ी में कई बार गलतियां कर बैठता है।
वे कहते हैं कि ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि सफलता हासिल की जाए, न कि इस बात पर कि वह कितनी जल्दी मिलती है। उनके अनुसार पढ़ाई के लिए एक तय दिनचर्या, विषयों पर मजबूत पकड़ और निरंतर अभ्यास बेहद आवश्यक है।
शून्य से शुरुआत का दर्शन
अपने जीवन के अनुभवों को आधार बनाकर वेद प्रकाश मिश्र ने एक कविता-कहानी भी लिखी है, जिसमें उन्होंने लिखा है— 'अगर मैं शून्य हूं, तो मैं बहुत कुछ हूं'। उनका कहना है कि शून्य को कभी छोटा नहीं आंकना चाहिए, क्योंकि शून्य से नीचे कुछ नहीं होता और हर बड़ी शुरुआत शून्य से ही होती है।
यही सोच उन्हें लगातार आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है और आज वे हजारों युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन चुके हैं।
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