राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 और पाकिस्तान की बेचैनी
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 की शुरुआत हो चुकी है और वैश्विक पटल पर इस समूह का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। भारत के नेतृत्व में ब्रिक्स अब एक अत्यंत शक्तिशाली अंतरराष्ट्रीय मंच के रूप में उभर चुका है, जिसे दुनिया के पावर सेंटर के तौर पर देखा जा रहा है। यही कारण है कि पाकिस्तान जैसे देश इस संगठन का हिस्सा बनने के लिए पूरी तरह बेताब दिखाई दे रहे हैं। पाकिस्तान की कोशिशें साल 2023 से जारी हैं, लेकिन भारत द्वारा लगाई गई रोक यानी वीटो पाकिस्तान के लिए एक ऐसी अभेद्य दीवार बन चुकी है जिसे पार करना उसके लिए नामुमकिन साबित हो रहा है।
भारत का रुख और वीटो की ताकत
ब्रिक्स की कार्यप्रणाली के अनुसार, किसी भी नए सदस्य को शामिल करने के लिए समूह के सभी वर्तमान सदस्य देशों की सहमति अनिवार्य होती है। यदि कोई एक सदस्य देश भी अपनी असहमति जताता है, तो उस आवेदन को खारिज माना जाता है। भारत की इसी शक्ति ने पाकिस्तान के अरमानों पर रोक लगा रखी है। भले ही पाकिस्तान को रूस और चीन जैसे देशों का राजनीतिक समर्थन प्राप्त हो, लेकिन भारत की स्पष्ट आपत्ति ने उसकी ब्रिक्स सदस्यता की राह को पूरी तरह से बंद कर रखा है। बीते तीन वर्षों से पाकिस्तान का आवेदन धूल फांक रहा है और वह इस वैश्विक समूह की दहलीज के बाहर खड़ा रहने को मजबूर है।
आर्थिक तंगी से जूझता पाकिस्तान और ब्रिक्स की उम्मीद
पाकिस्तान की ब्रिक्स में आने की छटपटाहट के पीछे मुख्य कारण उसकी जर्जर अर्थव्यवस्था है। पाकिस्तान आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश की GDP विकास दर महज 3.70 प्रतिशत रही है। अपनी आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वित्तीय सहयोग और नए साझेदारों की तलाश है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक कुल 29 देशों ने ब्रिक्स की सदस्यता के लिए आवेदन किया है, जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है। उसे उम्मीद है कि ब्रिक्स में शामिल होने से उसे न केवल नए वित्तीय विकल्प मिलेंगे, बल्कि वह विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) पर अपनी निर्भरता को भी कम कर सकेगा।
न्यू डेवलपमेंट बैंक और पाकिस्तान की रणनीति
अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए पाकिस्तान ने एक अलग रास्ता भी अपनाया है। निक्की एशिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने ब्रिक्स से जुड़े न्यू डेवलपमेंट बैंक में 580 मिलियन डॉलर की हिस्सेदारी खरीदी है। यह कदम संकेत देता है कि पाकिस्तान किसी भी तरह से ब्रिक्स के तंत्र में पैठ बनाने की कोशिश कर रहा है ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी जगह बना सके। हालांकि, संस्थागत सदस्यता मिलना और इस तरह का निवेश करना दो अलग विषय हैं, और फिलहाल सदस्यता के मामले में उसे भारत की कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
ब्रिक्स का बढ़ता वैश्विक कद
ब्रिक्स का विस्तार अब केवल एक आर्थिक गुट तक सीमित नहीं रहा है। इस समूह में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के जुड़ने के बाद इसका प्रभाव कई गुना बढ़ गया है। वर्तमान में ब्रिक्स में दुनिया की करीब 49 फीसदी आबादी निवास करती है। इसके अलावा, क्रय शक्ति समानता यानी PPP के आधार पर यह समूह विश्व की लगभग 40 फीसदी GDP का प्रतिनिधित्व करता है। भारत के लिए भी यह मंच अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि ब्रिक्स देशों के साथ भारत का व्यापारिक संबंध बहुत तेजी से मजबूत हुआ है। आंकड़ों के अनुसार, इन देशों को होने वाला भारत का निर्यात 48.8 फीसदी तक बढ़ गया है। यह आंकड़ा 64.3 अरब डॉलर से उछलकर 95.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जो इस समूह की उपयोगिता को दर्शाता है।
पाकिस्तान का आधिकारिक दावा
नवंबर 2023 में पाकिस्तानी विदेश कार्यालय के प्रवक्ता ने एक प्रेस वार्ता के दौरान आधिकारिक रूप से यह पुष्टि की थी कि पाकिस्तान ब्रिक्स का हिस्सा बनना चाहता है। उस दौरान पाकिस्तान ने यह तर्क दिया था कि उसके अधिकांश ब्रिक्स सदस्य देशों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध हैं और वह विकासशील देशों के इस समूह में शामिल होकर अपनी पहचान मजबूत करना चाहता है। रूस में पाकिस्तान के राजदूत मुहम्मद खालिद जमाली ने भी रूसी समाचार एजेंसी TASS को दिए एक साक्षात्कार में स्वीकार किया था कि पाकिस्तान सदस्य देशों से अपने पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए गहन राजनयिक प्रयास कर रहा है। उन्होंने विशेष रूप से रूस से समर्थन मांगे जाने की बात कही थी।
निष्कर्ष: क्यों भारत की ना है निर्णायक?
पाकिस्तान के लिए चीन और रूस का साथ होना एक बड़ी उपलब्धि जैसा हो सकता है, लेकिन ब्रिक्स के आंतरिक नियमों के आगे यह समर्थन निष्प्रभावी साबित हो रहा है। भारत की आपत्ति को अंतरराष्ट्रीय संबंधों के चश्मे से देखा जाए, तो यह पाकिस्तान की उन नीतियों के खिलाफ है जो क्षेत्रीय स्थिरता और भारत की सुरक्षा के लिए चुनौती बनती हैं। सर्वसम्मति का नियम ब्रिक्स की सबसे बड़ी विशेषता है, जिसका लाभ उठाकर भारत ने पाकिस्तान की प्रवेश की कोशिशों को हर बार सिरे से खारिज कर दिया है। नतीजा यह है कि तीन साल बाद भी पाकिस्तान की सदस्यता की फाइल ठंडे बस्ते में है और भारत का अडिग रुख ही इसकी सबसे बड़ी वजह है।
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