ब्रह्मोस क्यों है दुश्मनों के लिए सबसे बड़ा खौफ? जानिए नंबर-1 मिसाइल की ताकत पर ब्रह्मा चेलानी की राय राष्ट्रीय राजनीति 12 घंटे पहले 4
रणनीतिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी के मुताबिक भारत की ब्रह्मोस मिसाइल अपनी सुपरसोनिक रफ्तार, सी-स्किमिंग तकनीक और घातक मारक क्षमता के दम पर एशिया की सबसे चर्चित डिफेंस एक्सपोर्ट बन रही है। फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देश इसे चीन के बढ़ते समुद्री दबदबे के खिलाफ कारगर हथियार मान रहे हैं।

दुनिया में हथियारों की कमी नहीं है और मिसाइलों की बात करें तो कई देशों के पास एडवांस तकनीक से लैस घातक मिसाइलें मौजूद हैं। लेकिन कुछ हथियार ऐसे होते हैं जिनका नाम सुनते ही दुश्मन देशों की पूरी रणनीति बदल जाती है। भारत की ब्रह्मोस मिसाइल अब इसी श्रेणी में शामिल हो चुकी है। कभी सिर्फ भारत की सैन्य ताकत मानी जाने वाली यह सुपरसोनिक मिसाइल अब एशिया की सबसे चर्चित डिफेंस एक्सपोर्ट बनती जा रही है।

फिलीपींस से लेकर वियतनाम और इंडोनेशिया तक कई देश इसे खरीदने के लिए कतार में खड़े हैं। इसकी वजह केवल इसकी तेज रफ्तार नहीं है, बल्कि वह 'डर' है जो यह समुद्र में दुश्मन के जहाजों और सैन्य ठिकानों के बीच पैदा करती है। रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ और प्रोफेसर ब्रह्मा चेलानी ने ब्रह्मोस को 'गरीब देशों का सबसे बड़ा नेवल इक्वलाइजर' करार दिया है।

ब्रह्मोस की असली ताकत क्या है?

चेलानी का कहना है कि यह मिसाइल कम बजट वाले देशों को भी चीन जैसी विशाल नौसैनिक ताकत के सामने डटकर खड़े होने का दम देती है। यही कारण है कि अब ब्रह्मोस सिर्फ एक हथियार नहीं, बल्कि एशिया की नई सामरिक राजनीति का बड़ा चेहरा बन रही है। इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी रफ्तार और हमला करने का तरीका है।

यह मिसाइल मैक 2.8 से 3.0 की रफ्तार से उड़ती है, यानी आवाज की गति से लगभग तीन गुना तेज। इतनी तेज गति के कारण दुश्मन को प्रतिक्रिया देने तक का समय नहीं मिल पाता। खास बात यह है कि हमला करते समय ब्रह्मोस समुद्र की सतह से महज पांच मीटर ऊपर उड़ती है, जिसे 'सी-स्किमिंग फ्लाइट प्रोफाइल' कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि रडार इसे बहुत देर से पकड़ पाते हैं और जब तक दुश्मन सतर्क होता है, मिसाइल लक्ष्य के बेहद करीब पहुंच चुकी होती है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे दुनिया की सबसे घातक ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिनते हैं।

एशिया में क्यों बढ़ी ब्रह्मोस की मांग?

दक्षिण चीन सागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की लगातार बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने छोटे देशों की चिंता बढ़ा दी है। फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों के पास चीन की तरह विशाल नौसेना खड़ी करने का बजट नहीं है। ऐसे में ब्रह्मोस उनके लिए 'लो-कॉस्ट लेकिन हाई-इम्पैक्ट' विकल्प बनकर उभरी है।

तटीय इलाकों में ब्रह्मोस बैटरियां तैनात करके ये देश अपनी समुद्री सीमाओं को मजबूत सुरक्षा दे सकते हैं। ब्रह्मा चेलानी के मुताबिक ब्रह्मोस असममित युद्ध यानी Asymmetric Warfare का बेहतरीन हथियार है। इसका अर्थ है कि कम संसाधनों वाला देश भी इससे किसी बड़ी सैन्य ताकत को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। कम खर्च में बड़ा सैन्य संतुलन बनाना ही इसकी सबसे बड़ी खूबी है।

कैसे काम करती है ब्रह्मोस की घातक रणनीति?

ब्रह्मोस सिर्फ तेज ही नहीं, बल्कि इसका वार भी बेहद विनाशकारी माना जाता है। विज्ञान के नियम के अनुसार गति जितनी ज्यादा होगी, टक्कर की ऊर्जा भी उतनी ही अधिक होगी। ब्रह्मोस की सुपरसोनिक स्पीड इसे अमेरिकी हार्पून या फ्रांसीसी एक्सोसेट जैसी पारंपरिक सबसोनिक मिसाइलों की तुलना में कहीं ज्यादा घातक बनाती है। जब यह लक्ष्य से टकराती है तो इसका काइनेटिक इम्पैक्ट भारी तबाही मचा सकता है।

इस मिसाइल की एक और बड़ी ताकत इसकी बहु-भूमिका क्षमता है। इसे जमीन, समुद्र, हवा और पनडुब्बी तक से लॉन्च किया जा सकता है। भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों इसका इस्तेमाल करती हैं। इसी वजह से दुश्मन के लिए यह अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है कि हमला किस दिशा से होने वाला है।

चीन के लिए क्यों बढ़ी चिंता?

चीन की नौसैनिक रणनीति हमेशा बड़े युद्धपोतों और समुद्री विस्तार पर टिकी रही है। लेकिन ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें इसी रणनीति को चुनौती देती हैं। अगर किसी देश ने अपने तट पर ब्रह्मोस तैनात कर दी तो चीन के बड़े जहाजों के लिए उस इलाके में घुसना बेहद जोखिम भरा हो जाएगा। यही कारण है कि इंडो-पैसिफिक में ब्रह्मोस को चीन के खिलाफ प्रभावी 'डिटरेंस वेपन' माना जा रहा है।

फिलीपींस पहले ही भारत से ब्रह्मोस डील कर चुका है। इसके अलावा वियतनाम और इंडोनेशिया भी इस मिसाइल में गहरी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में ब्रह्मोस भारत की सबसे बड़ी डिफेंस एक्सपोर्ट पहचान बन सकती है।

भारत को क्या मिलेगा रणनीतिक फायदा?

ब्रह्मोस केवल एक हथियार नहीं, बल्कि भारत की कूटनीतिक ताकत भी बनती जा रही है। पश्चिमी देशों की तुलना में भारत हथियारों की बिक्री में कम राजनीतिक शर्तें रखता है और ट्रेनिंग, मेंटेनेंस तथा लॉजिस्टिक सपोर्ट का पूरा पैकेज मुहैया कराता है। यही वजह है कि कई विकासशील देश अब भारत को ज्यादा भरोसेमंद रक्षा साझेदार मानने लगे हैं।

इस एक्सपोर्ट से भारत को आर्थिक फायदा होगा और सामरिक प्रभाव भी बढ़ेगा। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की मौजूदगी मजबूत होगी और चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने में मदद मिलेगी। यही कारण है कि ब्रह्मोस अब महज एक मिसाइल नहीं, बल्कि भारत की नई सामरिक पहचान बनती जा रही है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

ब्रह्मोस को दुनिया की सबसे खतरनाक मिसाइलों में क्यों गिना जाता है?

इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी सुपरसोनिक स्पीड है। यह मैक 2.8 से 3.0 की गति से उड़ती है, जो आवाज की गति से लगभग तीन गुना तेज है। इतनी रफ्तार के कारण दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को प्रतिक्रिया देने का बेहद कम समय मिलता है। इसके अलावा सी-स्किमिंग फ्लाइट प्रोफाइल इसे और घातक बनाता है, क्योंकि यह समुद्र की सतह के बेहद करीब उड़ती है और देर से पकड़ में आती है।

छोटे देशों के लिए ब्रह्मोस इतनी अहम क्यों है?

फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों के पास बड़ी नौसेना खड़ी करने का बजट नहीं है। ऐसे में ब्रह्मोस उन्हें कम लागत में मजबूत समुद्री सुरक्षा देती है। तटीय इलाकों में इसकी तैनाती से वे चीन जैसी बड़ी नौसैनिक ताकत को भी चुनौती दे सकते हैं, इसीलिए इसे 'गरीब देशों का नेवल इक्वलाइजर' कहा जा रहा है।

भारत को ब्रह्मोस एक्सपोर्ट से क्या फायदा होगा?

इससे भारत को आर्थिक और रणनीतिक दोनों लाभ मिलेंगे। भारत की डिफेंस इंडस्ट्री मजबूत होगी, वैश्विक हथियार बाजार में उसकी हिस्सेदारी बढ़ेगी और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसका सामरिक प्रभाव भी बढ़ेगा। कई देश अब भारत को भरोसेमंद रक्षा साझेदार के रूप में देखने लगे हैं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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