मशीनों के दौर में भी कायम है हाथ का हुनर, बोकारो के 80 वर्षीय बुजुर्ग ऐसे बनाते हैं रस्सी झारखंड 2 महीने पहले 83
बोकारो के काशी झरिया गांव में 80 वर्षीय दिगम जी आज भी पुराने प्लास्टिक के बोरों से मजबूत रस्सियां बनाकर अपनी जीविका चला रहे हैं। मशीनों के आने से इस पारंपरिक कला पर संकट है, लेकिन बुजुर्ग कलाकार इसे पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं।

परंपरा और हुनर का अनोखा संगम

आज के मशीनी युग में जहां हर चीज फैक्ट्रियों में तैयार हो रही है, वहीं बोकारो जिले के चास प्रखंड स्थित काशी झरिया गांव में एक बुजुर्ग अपनी विरासत को संजोए हुए हैं। 80 वर्षीय दिगम जी अपने हाथों से प्लास्टिक की बोरियों को उपयोग में लाकर मजबूत रस्सियां तैयार करते हैं। यह हुनर उन्होंने बरसों पहले अपने पिता से सीखा था और आज भी वे इसे बखूबी निभा रहे हैं।

कैसे तैयार होती है यह रस्सी

दिगम जी ने बताया कि रस्सी बनाने की प्रक्रिया काफी मेहनत और समय मांगती है। सबसे पहले वे प्लास्टिक के पुराने बोरों की सिलाई खोलकर उन्हें अलग-अलग पट्टियों में विभाजित करते हैं। इसके बाद इन पट्टियों को हाथों से मरोड़कर और आपस में गूंथकर एक टिकाऊ रस्सी का रूप दिया जाता है। एक रस्सी को तैयार करने में लगभग 3 घंटे का समय लग जाता है। वे सप्ताह भर में करीब 40 से 50 रस्सियां तैयार कर लेते हैं।

आय का जरिया और बाजार की स्थिति

इन हस्तनिर्मित रस्सियों का उपयोग मुख्य रूप से पशुओं को बांधने, कुएं से पानी निकालने और अन्य घरेलू कार्यों में किया जाता है। इनकी कीमतों की बात करें तो बकरी के गले में बांधने वाली रस्सियों का जोड़ा 50 रुपये में मिलता है, जबकि बड़ी और मजबूत रस्सियां 100 से 150 रुपये तक बिकती हैं। दिगम जी इन्हें आसपास के गांवों और स्थानीय बाजारों में ले जाकर बेचते हैं।

लुप्त होती कला की चिंता

दिगम जी इस काम को करने वाली गांव की आखिरी पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं। उनका कहना है कि नई पीढ़ी में अब इस कला को सीखने के प्रति कोई रुचि नहीं है। बाजार में मशीनों से बनी सस्ती रस्सियों की भरमार ने उनके काम को काफी प्रभावित किया है। एक समय था जब वे सप्ताह में 100 रस्सियां बेच लेते थे, लेकिन अब यह संख्या घटकर 30 से 40 तक रह गई है। बावजूद इसके, वे अपनी पहचान को बचाए रखने के लिए आखिरी सांस तक इस काम को जारी रखने का संकल्प लिए हुए हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप