बिहार
एक घंटा पहले
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विचारों
मक्का खेती और किसानों की चुनौती
बिहार राज्य मक्का उत्पादन के मामले में पूरे देश में तीसरा स्थान रखता है। राज्य के कई हिस्सों में मक्के की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है। इसी कड़ी में दक्षिण बिहार के गया जिले के ग्रामीण इलाकों में भी मक्के की बंपर पैदावार होती है। उदाहरण के तौर पर, इमामगंज प्रखंड स्थित भगहर गांव में करीब 50 एकड़ जमीन पर मक्के की खेती की जाती है। फसल तैयार होने के बाद किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती मक्के की बालियों से दाना अलग करने की होती थी, जिसके लिए उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। हालांकि, अब बाजार में उपलब्ध आधुनिक थ्रेशिंग मशीनों ने इस समस्या को काफी हद तक हल कर दिया है।
मशीन की विशेषताएं और कार्यक्षमता
यह मक्का थ्रेशिंग मशीन छोटे किसानों के लिए बेहद उपयोगी सिद्ध हो रही है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी कार्यक्षमता है, जो महज एक घंटे में 3 से 4 क्विंटल तक मक्का निकालने में सक्षम है। सामान्य तौर पर, यह मशीन 1 एचपी या 2 एचपी की इलेक्ट्रिक मोटर अथवा डीजल-पेट्रोल इंजन के साथ संचालित होती है। बाजार में इन छोटे मशीनों के आने से किसानों का काम काफी आसान हो गया है और उन्हें फसल के बाद की प्रक्रिया में काफी लाभ मिल रहा है।
हाथों की मेहनत से मिली मुक्ति
पुराने समय में जब किसान हाथों से मक्का निकाला करते थे, तो इसमें न केवल लंबा समय लगता था, बल्कि किसानों को शारीरिक थकान और हाथों में छालों जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता था। अब इस मशीन के उपयोग से छोटे किसान अपने घर पर ही बड़ी सहजता के साथ मक्के के दाने निकाल पा रहे हैं। भगहर गांव, जो मक्का उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है, वहां तो अब लगभग हर घर में यह मशीन देखी जा सकती है।
इनवर्टर और बिजली का विकल्प
भगहर गांव के किसान रवींद्र प्रसाद ने इस मशीन की एक विशेष खूबी साझा की है। उन्होंने बताया कि इस मशीन की सबसे अच्छी बात यह है कि यदि गांव में बिजली न हो, तो भी इसे आसानी से इनवर्टर के जरिए चलाया जा सकता है। इसके अलावा, यह मशीन बिजली की खपत भी काफी कम करती है।
आर्थिक और समय की बचत
रवींद्र प्रसाद ने आगे बताया कि पहले हाथ से मक्का निकालने के लिए उन्हें अधिक मजदूरी का भुगतान करना पड़ता था, फिर भी दिन भर में केवल 3 से 4 क्विंटल दाना ही निकल पाता था। इस मशीन के आने से अब दिन भर में 15 से 20 क्विंटल तक मक्का आसानी से निकाला जा सकता है। करीब 14 हजार रुपये की लागत वाली यह मशीन अब किसानों के लिए न केवल समय बचा रही है, बल्कि उनकी आय और कार्यक्षमता में भी बढ़ोतरी कर रही है।
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