राष्ट्रीय राजनीति
2 महीने पहले
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दिल्ली में पैदल यात्रियों के लिए घटती जगह और बढ़ते खतरे
दिल्ली की सड़कों पर रोजाना लाखों लोग पैदल चलते हैं, लेकिन उनके चलने के लिए बची हुई सुरक्षित जगह अब न के बराबर है। राजधानी की सड़कों की स्थिति इतनी भयावह है कि कई जगहों पर फुटपाथ या तो पूरी तरह से गायब हैं या फिर उन्हें अनधिकृत पार्किंग में तब्दील कर दिया गया है। कहीं रेहड़ी-पटरी वालों का अवैध कब्जा है तो कहीं फुटपाथ ही नजर नहीं आते। ऐसी स्थिति में आम नागरिक अपनी जान को दांव पर लगाकर सड़क के बीचों-बीच चलने को मजबूर हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर मुद्दे पर हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि पैदल चलना कोई सुविधा नहीं, बल्कि नागरिक का मौलिक अधिकार है। अदालत ने कहा है कि पैदल यात्रियों का अधिकार मोटर वाहनों के परिचालन से कहीं ऊपर है। लेकिन सवाल यही है कि क्या दिल्ली में पैदल चलने वालों को यह संवैधानिक सुरक्षा मिल पाएगी या व्यवस्था यूं ही अतिक्रमण और पार्किंग की भेंट चढ़ती रहेगी।
मौलिक अधिकार के रूप में पैदल चलना
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए. एस. चंदूरकर की पीठ ने एक महत्वपूर्ण मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। यह मामला एक पांच वर्षीय बच्चे की मौत से जुड़ा था। अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा कि निर्धारित फुटपाथों पर चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) के तहत मिली स्वतंत्रताओं और अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त जीवन के अधिकार का एक अभिन्न अंग है। पीठ ने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक सड़कों और फुटपाथों पर पैदल चलने वालों का पहला हक है, जिसे किसी भी स्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अतिक्रमण और सरकारी एजेंसियों की भूमिका
इस फैसले के बाद कानूनी जानकारों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं का मानना है कि यह निर्णय अधिकारियों की जिम्मेदारी को और अधिक कड़ा करता है। वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक के. सिंह का कहना है कि यह फैसला न केवल आम जनता में जागरूकता बढ़ाएगा, बल्कि अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया को भी कानूनी मजबूती प्रदान करेगा। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा और नागरिकों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करना सरकारी एजेंसियों का संवैधानिक दायित्व है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस समस्या की जड़ें दिल्ली नगर निगम यानी एमसीडी और नयी दिल्ली नगरपालिका परिषद यानी एनडीएमसी के क्षेत्रों में काफी गहरी हैं। उन्होंने कहा कि इन एजेंसियों ने फुटपाथों को पार्किंग जोन में बदल दिया है। यहाँ हर वक्त गाड़ियाँ कतार में खड़ी रहती हैं, जिससे पैदल चलने वालों के लिए रत्ती भर भी जगह नहीं बचती।
पार्किंग का खेल और सरकारी चालान
आंकड़े इस समस्या की भयावहता की पुष्टि करते हैं। इस साल जनवरी से मार्च के बीच दिल्ली यातायात पुलिस ने गलत या रास्ता रोकने वाली पार्किंग के लिए कुल 4,30,202 चालान जारी किए हैं। यह शहर में यातायात नियमों के उल्लंघन का सबसे आम और प्रचलित मामला बना हुआ है। अधिवक्ता अशोक के. सिंह का दावा है कि कई जगहों पर फुटपाथों को पार्किंग के लिए बाकायदा पट्टे पर दे दिया गया है। अगर आप दिल्ली में कहीं भी फुटपाथ पर अपनी गाड़ी रोकते हैं, तो चंद सेकंड में पार्किंग संचालक आकर पर्ची थमा देते हैं। कई बार ये पर्चियाँ एनडीएमसी की मंजूरी से जारी की जाती हैं। सरकारी लाइसेंस प्राप्त ये संचालक फुटपाथ पर कब्जा करके पार्किंग शुल्क वसूल रहे हैं, जो सीधे तौर पर नियमों का उल्लंघन है।
निवासियों का दर्द और असुरक्षित रास्ते
दिल्ली के निवासी भी इस व्यवस्था से बेहद परेशान हैं। स्थानीय नागरिक रोशन कुमार का कहना है कि सरकारें लंबे समय से कार्रवाई के दावे कर रही हैं, लेकिन धरातल पर स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। उन्होंने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि कुछ दिन पहले ही वे अपने बच्चे के साथ टहल रहे थे, तभी एक दुर्घटना होते-होते बची। पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित जगह न होने की वजह से वे मजबूरन सड़क पर चलने को विवश हैं। एक अन्य स्थानीय नागरिक संजय कुमार ने भी कहा कि पार्किंग के लिए फुटपाथों का इस्तेमाल करना ही पूरी तरह गलत है। कई इलाकों में तो पैदल चलने के लिए फुटपाथ का अस्तित्व ही मिट चुका है।
आंकड़ों की जुबानी: मौत का आंकड़ा और अध्ययन
शैक्षणिक और आधिकारिक शोध भी इस समस्या की पुष्टि करते हैं। आईआईटी दिल्ली के 'ट्रांसपोर्टेशन रिसर्च एंड इंजरी प्रिवेंशन सेंटर' ने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के साथ मिलकर एक अध्ययन किया, जिसमें चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली की लगभग 44 प्रतिशत सड़कों पर फुटपाथ का नामोनिशान नहीं है। इसी का परिणाम है कि दिल्ली पुलिस के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में सड़क दुर्घटनाओं में 649 पैदल यात्रियों की दर्दनाक मौत हुई, जबकि 1,738 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। पैदल यात्रियों की मौत के कारणों में निजी कारें सबसे ऊपर रहीं, जिनसे 92 लोगों की मौत हुई। इसके बाद दोपहिया वाहनों से 75 और भारी मालवाहक ट्रकों से 43 पैदल यात्रियों ने अपनी जान गंवाई। इससे पहले साल 2022 में दिल्ली में कुल 1,461 घातक सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें से 43 प्रतिशत मृतक पैदल यात्री ही थे।
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