धान की बंपर पैदावार के लिए अपनाएं ये उन्नत तकनीकें, प्रति एकड़ 40 क्विंटल तक उत्पादन का लक्ष्य बिहार एक घंटा पहले 3
धान की खेती में पारंपरिक तरीकों को छोड़कर अब किसान आधुनिक हाइब्रिड किस्मों और नई तकनीक का उपयोग कर अपनी आय दोगुनी कर रहे हैं। इन वैज्ञानिक विधियों से कम पानी और कम लागत में प्रति एकड़ 40 क्विंटल तक उपज प्राप्त करना संभव हो गया है।

धान की खेती का नया दौर

आज के दौर में धान की खेती का चेहरा तेजी से बदल रहा है। किसान अब पुरानी और पारंपरिक किस्मों के बजाय आधुनिक और उन्नत हाइब्रिड बीजों को अपनाकर अपने खेत से बंपर पैदावार हासिल कर रहे हैं। पारंपरिक धान की खेती में जहां औसत पैदावार आमतौर पर 20 से 25 क्विंटल प्रति एकड़ तक ही सीमित रहती है, वहीं नई उन्नत किस्में इस आंकड़े को बड़ी आसानी से 30 से 40 क्विंटल या उससे भी अधिक तक ले जा सकती हैं। सही प्रबंधन, संतुलित उर्वरक और वैज्ञानिक देखरेख के फार्मूले को अपनाकर किसान अपनी कमाई को दोगुना करने में सफल हो रहे हैं।

उन्नत किस्मों का चुनाव

सही किस्म का चयन सफलता की पहली सीढ़ी है। किसान भाई बाजार में उपलब्ध लोकप्रिय और उच्च उत्पादन क्षमता वाली किस्मों का चुनाव कर सकते हैं। इनमें IR-64, MTU-1010, MTU-1001, स्वर्णा, नवीन और पूसा DST Rice 1 जैसी किस्में प्रमुख हैं, जो न केवल रोग प्रतिरोधी हैं बल्कि कम समय में पककर तैयार भी हो जाती हैं। इसके अलावा हाइब्रिड किस्मों की मांग भी काफी बढ़ी है। Arize 6444 Gold, PHB-71, KRH-2 और DRRH-2 जैसी हाइब्रिड किस्में सामान्य बीजों की तुलना में 20 से 35 प्रतिशत तक अधिक उपज देने में सक्षम हैं। इनमें से कुछ चुनिंदा किस्में तो प्रति एकड़ 40 क्विंटल तक का आंकड़ा पार करने का सामर्थ्य रखती हैं।

खेती की उन्नत विधियां

उत्पादन को अधिकतम करने के लिए खेत की तैयारी पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। सबसे पहले मिट्टी को अच्छी तरह जुताई करके भुरभुरा बनाएं और पर्याप्त मात्रा में गोबर की सड़ी खाद का उपयोग करें। यदि आप नर्सरी विधि से रोपाई कर रहे हैं, तो 20 से 25 दिन पुरानी पौध का उपयोग करें और पौधों के बीच 20 से 25 सेमी की दूरी बनाए रखें।

इन दिनों SRI यानी सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन विधि काफी चर्चा में है। इस तकनीक में 8 से 15 दिन की छोटी पौध का उपयोग किया जाता है। इसमें हर पौधा अलग-अलग लगाया जाता है और दूरी 25x25 सेमी रखी जाती है। इस विधि की खासियत यह है कि इसमें पानी की खपत कम होती है और खेत में लगातार पानी भरने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे जड़ें अधिक मजबूत होती हैं और पैदावार में भारी वृद्धि होती है। इसके अतिरिक्त DSR यानी सीधी बुआई की तकनीक अपनाकर भी जल संरक्षण किया जा सकता है।

खाद और सुरक्षा का प्रबंधन

फसल को नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश जैसे उर्वरकों की संतुलित खुराक देना अनिवार्य है। साथ ही समय-समय पर खरपतवार निकालना बेहद जरूरी है। खेती के दौरान कुछ सावधानियां बरतकर नुकसान से बचा जा सकता है। हमेशा प्रमाणित बीज का ही उपयोग करें और बुआई से पहले फफूंदनाशक दवा से बीज उपचार अवश्य करें।

खेत में पानी का सही प्रबंधन करें क्योंकि जरूरत से ज्यादा पानी फसलों में रोगों को न्योता दे सकता है। ब्लास्ट, BLB और तना छेदक जैसे कीटों और बीमारियों की निरंतर निगरानी रखें और लक्षण दिखते ही उचित कीटनाशकों का छिड़काव करें। यह ध्यान रखें कि रोपाई में देरी न हो क्योंकि देरी से फसल की उपज कम हो सकती है। जब फसल के 80 से 85 प्रतिशत दाने पक जाएं, तब कटाई करें और अनाज को पूरी तरह सुखाने के बाद ही भंडारण करें। इन वैज्ञानिक तरीकों से सामान्य खेती के 25 से 30 क्विंटल के मुकाबले किसान अब 35 से 50 क्विंटल तक पैदावार ले रहे हैं। अधिक जानकारी के लिए आप अपने स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से भी परामर्श ले सकते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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