यूरिया का खर्च आधा! धान के खेत में फैला दें अजोला की हरी चादर, बढ़ेगी पैदावार और घटेगा खरपतवार झारखंड एक घंटा पहले 2
धान के खेत में अजोला नाम का जलीय पौधा बिछाने से फसल को प्राकृतिक नाइट्रोजन मिलती है, जिससे यूरिया का खर्च आधा हो जाता है। यह पानी की सतह पर हरी चादर की तरह फैलकर खरपतवार रोकता है और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है।

जून और जुलाई का महीना शुरू होते ही धान की खेती की तैयारियां जोर पकड़ लेती हैं। किसान नर्सरी तैयार करने से लेकर खेतों की जुताई और रोपाई की योजना बनाने में जुट जाते हैं। ऐसे मौके पर सबसे बड़ी चिंता खेती की बढ़ती लागत बन जाती है, खासकर यूरिया और दूसरी रासायनिक खादों पर होने वाला खर्च। धान की बेहतर पैदावार के लिए फसल को बड़ी मात्रा में नाइट्रोजन चाहिए होती है, जिसकी पूर्ति के लिए आमतौर पर यूरिया का सहारा लिया जाता है।

अब कृषि वैज्ञानिक किसानों को एक ऐसे प्राकृतिक विकल्प की सलाह दे रहे हैं, जो न केवल यूरिया पर होने वाला खर्च घटा सकता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी मददगार है। इस विकल्प का नाम है अजोला। धान की खेती में अजोला का इस्तेमाल धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रहा है, क्योंकि यह कम खर्च में फसल को जरूरी पोषक तत्व देता है और खेती को ज्यादा फायदेमंद बनाता है।

क्या कहते हैं कृषि विशेषज्ञ

कृषि विशेषज्ञ वकील यादव बताते हैं कि अजोला एक तरह का जलीय पौधा है, जो पानी की सतह पर तेजी से फैलता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले सूक्ष्म जीव मौजूद रहते हैं। यही वजह है कि अजोला खेत में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन उपलब्ध कराता है।

उनके मुताबिक, धान की रोपाई के कुछ दिनों बाद अगर खेत में अजोला छोड़ दिया जाए तो यह तेजी से पूरे खेत में फैल जाता है। धीरे-धीरे यह सड़कर मिट्टी में मिल जाता है और फसल को पोषक तत्व देता है। इससे किसानों को बार-बार यूरिया डालने की जरूरत कम पड़ती है और खाद पर होने वाला खर्च भी काफी घट जाता है।

मिट्टी की गुणवत्ता भी सुधरती है

विशेषज्ञ बताते हैं कि अजोला सिर्फ नाइट्रोजन की पूर्ति ही नहीं करता, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने का काम भी करता है। लगातार रासायनिक खादों के उपयोग से मिट्टी की सेहत पर असर पड़ता है, जबकि अजोला जैविक पदार्थ के रूप में मिट्टी में मिलकर उसकी संरचना को बेहतर बनाता है।

इससे मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ती है और पौधों की जड़ें भी ज्यादा मजबूत होती हैं। मजबूत मिट्टी और स्वस्थ जड़ों का सीधा असर फसल की वृद्धि और उत्पादन पर दिखता है। यही कारण है कि कई किसान अब धान की खेती में अजोला को एक उपयोगी जैविक खाद के रूप में अपना रहे हैं।

खेत में खरपतवार को करता है कम

अजोला का एक और बड़ा फायदा यह है कि यह खेत में खरपतवार को नियंत्रित करने में मदद करता है। जब अजोला पानी की सतह पर फैल जाता है तो सूरज की रोशनी सीधे पानी के अंदर नहीं पहुंच पाती। इससे खरपतवार के बीजों का अंकुरण कम हो जाता है और खेत में अनावश्यक घास-फूस की समस्या घटती है।

नतीजतन किसानों को खरपतवार नियंत्रण पर कम खर्च करना पड़ता है। इसके अलावा अजोला खेत में नमी बनाए रखने में भी मदद करता है, जिससे पौधों को अनुकूल वातावरण मिलता है।

लाभकारी विकल्प बनकर उभर रहा है अजोला

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर किसान धान की खेती में अजोला का नियमित इस्तेमाल करें तो वे रासायनिक खादों पर अपनी निर्भरता काफी हद तक कम कर सकते हैं। इससे खेती की लागत घटेगी, मिट्टी की सेहत सुधरेगी और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचेगा।

आज के दौर में जब खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, तब अजोला किसानों के लिए एक सस्ता, टिकाऊ और लाभकारी विकल्प बनकर उभर रहा है। इसलिए धान उत्पादक किसानों को इस प्राकृतिक जैविक खाद के उपयोग पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, ताकि कम खर्च में बेहतर उत्पादन हासिल किया जा सके और खेती को अधिक लाभदायक बनाया जा सके।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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