भारत को झुकाने की अमेरिकी कोशिशें हुईं नाकाम, भारत-रूस संबंधों पर ट्रंप की रणनीति का उल्टा असर विश्व 2 घंटे पहले 6
भारत पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बनाने का अमेरिका का प्रयास पूरी तरह से विफल साबित हुआ है। धमकियों और पाबंदियों के कारण भारत और अमेरिका के बीच चल रही फ्री ट्रेड डील खटाई में पड़ गई है, क्योंकि भारत ने वाशिंगटन के दबाव में झुकने से साफ इनकार कर दिया है।

अमेरिका की आक्रामक रणनीति का उल्टा असर

भारत पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बनाने का अमेरिका का दांव अब उसी के लिए जी का जंजाल बन गया है। ट्रंप प्रशासन ने जिस तरह से धमकियों और पाबंदियों की भाषा का इस्तेमाल किया, उसका सीधा असर भारत-अमेरिका के बीच हो रही फ्री ट्रेड डील पर पड़ा है, जो अब पूरी तरह से ठप्प हो गई है। वाशिंगटन को लग रहा था कि वह अपनी शर्तों पर भारत को नचा लेगा, लेकिन नई दिल्ली ने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

भारत-रूस की दोस्ती को निशाना बनाने की कोशिश

ट्रंप प्रशासन की ओर से 'लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट' के नाम से लाए गए कानून का मुख्य उद्देश्य भारत और रूस के बीच दशकों पुरानी रणनीतिक और आर्थिक मित्रता में दरार पैदा करना है। अमेरिका का पूरा ध्यान इस बात पर है कि किसी भी तरह भारत रूस से कच्चा तेल और हथियार खरीदना बंद कर दे। इस कानून में अमेरिकी राष्ट्रपति को असीमित अधिकार दिए गए हैं, जिसके तहत रूस से तेल खरीदने वाले देशों के उत्पादों पर 100% तक का भारी पेनल्टी टैरिफ लगाया जा सकता है। अमेरिका का मानना था कि इस 100% टैरिफ का भय दिखाकर वह भारत को अपनी मर्जी के मुताबिक ढाल लेगा, लेकिन वाशिंगटन की यह गणना गलत साबित हुई।

चीन को छोड़ भारत को टारगेट करना

अमेरिका का यह दोहरा रवैया अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी कूटनीतिक नाकामी को उजागर करता है। हकीकत यह है कि रूस से सबसे अधिक कच्चा तेल और गैस का आयात चीन कर रहा है, बावजूद इसके अमेरिका का पूरा ध्यान भारत को घेरने पर केंद्रित है। हैरानी की बात यह है कि संकट के इस दौर में भारत ने अमेरिकी ऊर्जा बाजार को बहुत सहारा दिया है। भारत न केवल अमेरिकी LNG का बड़ा खरीदार बनकर उभरा है, बल्कि वेनेजुएला के तेल को खरीदने में भी भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने सक्रियता दिखाई है, जो परोक्ष रूप से अमेरिकी हितों की ही रक्षा कर रही थी। इसके बावजूद अमेरिका का भारत को निशाना बनाना उसकी विदेश नीति की सबसे बड़ी कमजोरी को दर्शाता है।

क्यों रुकी भारत-अमेरिका ट्रेड डील?

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता के अटकने के पीछे कई ठोस कारण हैं। अमेरिका की मंशा यह है कि भारत अपने औद्योगिक, कृषि और डिजिटल क्षेत्र को अमेरिकी कंपनियों के लिए पूरी तरह से खोल दे। वे अमेरिकी डेयरी उत्पाद, पोल्ट्री और टेक कंपनियों के लिए भारतीय बाजार पर कब्जा चाहते हैं। लेकिन दूसरी तरफ भारत सरकार के सामने अपने करोड़ों छोटे व्यापारियों, किसानों और घरेलू उद्योगों के हितों की रक्षा करना सर्वोच्च प्राथमिकता है। अमेरिका का दोहरा चरित्र तब सामने आता है जब वह बातचीत के दौरान मीठी बातें करता है और दूसरी तरफ 100% पाबंदियों की तलवार लटकाए रखता है। इस दबावपूर्ण वातावरण में कोई भी व्यापारिक समझौता करना भारत के लिए अपने आर्थिक हितों को दांव पर लगाने जैसा होता, जिसे सरकार ने बिल्कुल स्वीकार नहीं किया।

रूस के साथ अटूट रिश्ता

ट्रंप प्रशासन को यह उम्मीद थी कि अमेरिका का विशाल बाजार भारत को रूस से अलग कर देगा, लेकिन भारत ने अपनी विदेश नीति की स्पष्टता को बरकरार रखा है। तमाम पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद भी भारत और रूस के संबंध रत्ती भर भी प्रभावित नहीं हुए हैं। रूस आज भी भारत का सबसे बड़ा ऊर्जा साझेदार बना हुआ है, जबकि रक्षा और सैन्य उपकरणों की आपूर्ति के मामले में दोनों देशों का आपसी विश्वास और गहरा हुआ है। भारत ने यह सिद्ध कर दिया है कि उसकी विदेश नीति किसी तीसरे देश के इशारे पर संचालित नहीं होती। अंत में, वाशिंगटन की इस हठधर्मिता के कारण अमेरिका ने खुद को भारतीय बाजार में मिलने वाले बेहतरीन अवसरों से वंचित कर लिया है।

ब्रह्मा चेलानी का विश्लेषण और भारत की कूटनीति

जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट ब्रह्मा चेलानी के अनुसार, भारत को अपनी सुरक्षा और राष्ट्रीय लाभ को लेकर रत्ती भर भी समझौता नहीं करना चाहिए। वाशिंगटन का यह सोचना कि वह पाबंदियों और जुर्माने के जरिए भारत जैसे बड़े लोकतंत्र को झुका लेगा, उसकी एक बड़ी रणनीतिक भूल है। भारत अपनी बहुपक्षीय कूटनीति (Multi-alignment) पर मजबूती से टिका हुआ है। अब भारत पूरी तरह से स्वतंत्र है कि वह अपनी अर्थव्यवस्था की जरूरत के हिसाब से कहां से तेल खरीदे, किससे हथियारों का सौदा करे और किसके साथ व्यापार के संबंध बढ़े।

निष्कर्ष: धमकियों से नहीं, बराबरी से बनेगी बात

इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि अमेरिका की प्रेशर टैक्टिक्स अब काम नहीं आने वाली है। भारत 1.4 अरब की आबादी वाला एक आत्मनिर्भर बाजार है। यदि अमेरिका को एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में एक मजबूत रणनीतिक साझेदार चाहिए, तो उसे 'हुक्म चलाने' की मानसिकता को त्यागना होगा। नई दिल्ली ने साफ कर दिया है कि जब तक अमेरिका बराबरी और सम्मान के साथ मेज पर नहीं बैठेगा और धमकियों का सिलसिला बंद नहीं करेगा, तब तक किसी भी बड़ी ट्रेड डील की उम्मीद करना व्यर्थ है। अमेरिका को अपनी पुरानी नीतियों की समीक्षा करने की सख्त जरूरत है।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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