हवाई सफर का पूरा इतिहास बदल देने वाली वो तारीख, जब 9/11 के बाद एयरपोर्ट्स की सुरक्षा एक नई हकीकत बनी
विश्व
4 घंटे पहले
5
विचारों
एयरपोर्ट सुरक्षा का वह दौर जो अब इतिहास बन गया है
आज अगर आप दिल्ली के IGI एयरपोर्ट पर अपनी उड़ान पकड़ने जाते हैं, तो आपको कम से कम तीन घंटे पहले वहां पहुंचना पड़ता है। लंबी कतारों में खड़ा होना, सुरक्षा एजेंसियों के कड़े निर्देशों का पालन करना और कई चरणों वाली जांच प्रक्रिया से गुजरना आज हवाई यात्रा का हिस्सा बन चुका है। लेकिन आज से 25 साल पहले तस्वीर बिल्कुल अलग थी। उस समय एयरपोर्ट्स पर सुरक्षा व्यवस्था का स्तर आज के किसी साधारण रेलवे स्टेशन जैसा होता था। यात्री अपनी फ्लाइट के समय से महज 30 मिनट पहले एयरपोर्ट पहुंच जाते थे और उनके परिजन उन्हें सीधे बोर्डिंग गेट तक छोड़ने जाते थे। लेकिन 11 सितंबर 2001 के दिन हुए भीषण आतंकी हमलों ने पूरी दुनिया में हवाई सुरक्षा की परिभाषा को हमेशा के लिए बदल दिया।
11 सितंबर 2001 की वह काली सुबह
11 सितंबर 2001 की उस सुबह ने हवाई यात्रा की तमाम सहूलियतों को एक भयानक त्रासदी में बदल दिया। कुल 19 आतंकियों ने उस समय की एयरपोर्ट सुरक्षा की कमजोरियों का फायदा उठाया। उन्होंने बेहद मामूली दिखने वाले बॉक्स कटर का इस्तेमाल कर अमेरिका के 4 कमर्शियल विमानों को हाईजैक कर लिया। इन विमानों को न्यूयॉर्क के प्रसिद्ध ट्विन टावर्स और पेंटागन से टकरा दिया गया। इस भयावह हमले में लगभग 3,000 निर्दोष लोगों ने अपनी जान गंवाई। इस घटना के बाद से ही दुनिया भर के देशों ने अपनी हवाई सुरक्षा को लेकर गंभीरता से सोचना शुरू किया और नियमों को पूरी तरह बदल दिया गया।
टीएसए का जन्म और सुरक्षा का सरकारीकरण
हमले के बाद अमेरिकी प्रशासन को यह स्पष्ट हो गया कि हवाई अड्डों की सुरक्षा को निजी कंपनियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसके परिणाम स्वरूप, अमेरिकी सरकार ने ट्रांसपोर्टेशन सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन (TSA) की स्थापना की और देश के सभी हवाई अड्डों की सुरक्षा का जिम्मा सीधे तौर पर अपने हाथों में ले लिया। सुरक्षा में सबसे पहला और महत्वपूर्ण बदलाव विमानों के कॉकपिट दरवाजों में किया गया। कॉकपिट के दरवाजों को इतना सशक्त और बुलेटप्रूफ बनाया गया कि कोई भी बाहरी व्यक्ति या आतंकी उन्हें तोड़कर अंदर प्रवेश न कर सके। आज हम जो लंबी कतारों में खड़े होकर अपनी आईडी दिखाते हैं, उस पूरी प्रणाली की नींव इसी 2001 की घटना के बाद रखी गई थी।
2006 का लिक्विड बैन और जूतों की तलाशी
9/11 के ठीक 5 साल बाद यानी 2006 में एक और बड़ी आतंकी साजिश का पर्दाफाश हुआ। ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों ने एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय आतंकी नेटवर्क को पकड़ा जो अमेरिका और कनाडा जाने वाली उड़ानों में पानी या जूस की बोतलों के माध्यम से तरल विस्फोटक (लिक्विड एक्सप्लोसिव) ले जाकर धमाका करने की योजना बना रहा था। इस साजिश के सामने आने के बाद दुनिया भर के एयरपोर्ट्स पर नियमों को रातों-रात और अधिक सख्त कर दिया गया। हैंड बैग में जेल, लिक्विड या किसी भी तरह के पेस्ट ले जाने पर कड़ी पाबंदी लगा दी गई। आज भी सुरक्षा जांच के दौरान यात्री 100ml से ज्यादा तरल पदार्थ अपने साथ नहीं ले जा सकते और इसे एक पारदर्शी प्लास्टिक थैली में रखना अनिवार्य है। इसी समय के आसपास सुरक्षा जांच के दौरान जूते उतारने का नियम भी लागू हुआ था, क्योंकि एक आतंकी ने अपने जूतों के भीतर बम छिपाने की कोशिश की थी। हालांकि, जुलाई 2025 में ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी हवाई अड्डों पर यात्रियों के जूते उतारने की इस बाध्यता को समाप्त कर दिया है, फिर भी विश्व के अनेक देशों में यह जांच प्रक्रिया अभी भी जारी है।
2008: कार्गो और सामान की सुरक्षा
शुरुआती दौर में सुरक्षा एजेंसियों का मुख्य ध्यान केवल यात्रियों और उनके साथ रखे हैंड बैग्स तक सीमित था। लेकिन साल 2008 तक आते-आते एजेंसियों को इस बात का एहसास हुआ कि सुरक्षा का खतरा केवल यात्रियों से ही नहीं है, बल्कि विमान के कार्गो होल्ड में लोड किए जाने वाले भारी सामान से भी है। इसके बाद एयरपोर्ट्स पर खोजी कुत्तों की तैनाती बड़े स्तर पर की गई। अब यह सुनिश्चित किया जाने लगा कि विमान के निचले हिस्से में रखा जाने वाला हर सामान पूरी तरह से सुरक्षित है और उसमें कोई भी घातक सामग्री नहीं है।
अंडरवेयर बॉम्बर और आधुनिक स्कैनर्स
हवाई अड्डे पर सुरक्षा जांच के दौरान यात्रियों को एक केबिन में खड़े होकर अपने हाथ ऊपर उठाने और पैर फैलाने के लिए क्यों कहा जाता है, इसके पीछे क्रिसमस 2009 की एक खतरनाक घटना है। नॉर्थवेस्ट एयरलाइंस की एक उड़ान के दौरान एक आतंकी ने अपने अंडरवेयर में छिपाए गए प्लास्टिक विस्फोटक को डेट्रॉइट के पास उड़ाने का प्रयास किया था। यद्यपि वह बम पूरी तरह से नहीं फट सका, लेकिन उस घटना ने सुरक्षा तंत्र में एक बड़ी कमी उजागर कर दी, क्योंकि पारंपरिक मेटल डिटेक्टर कपड़ों के भीतर छिपे प्लास्टिक विस्फोटकों को पकड़ने में असमर्थ थे। इस घटना के बाद TSA ने फुल-बॉडी स्कैनर्स को तेजी से तैनात करना शुरू किया। ये स्कैनर रेडियो वेव्स का उपयोग करते हैं और कपड़ों के अंदर छिपी हर संदिग्ध वस्तु को डिटेक्ट करने में सक्षम हैं।
डिजिटल क्रांति और भविष्य की सुरक्षा
9/11 की घटना को बीते हुए लगभग 2 दशक से ज्यादा का समय हो चुका है और अब सुरक्षा प्रक्रियाएं डिजिटल युग में प्रवेश कर चुकी हैं। वर्तमान में एयरपोर्ट्स पर चेकिंग की गति और सटीकता बढ़ाने के लिए बायोमेट्रिक स्क्रीनिंग और फेशियल रिकग्निशन का बड़े पैमाने पर उपयोग हो रहा है। यात्रियों को अब बार-बार अपने दस्तावेज या बोर्डिंग पास दिखाने की आवश्यकता कम हो गई है, क्योंकि चेहरा अब पहचान का प्राथमिक माध्यम बन गया है। भारत में 'डिजीयात्रा' जैसी बायोमेट्रिक प्रणालियां इसी आधुनिक सुरक्षा क्रांति का एक हिस्सा हैं, जिसकी नींव परोक्ष रूप से 2001 के बाद बनी उस सुरक्षा संस्कृति के कारण पड़ी है, जिसने विमानन जगत को हमेशा के लिए सुरक्षित बनाने की दिशा में मजबूर किया।
Comments
0 comment