धर्म की दीवारें पड़ीं फीकी: मुस्लिम घर में जन्मे अलीबख़्श के हृदय में बसे श्रीकृष्ण, पढ़ें उनके सफर की दास्तान राजस्थान 7 घंटे पहले 3
मुस्लिम परिवार में जन्मे अलीबख़्श बचपन से ही भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति की ओर खिंचते चले गए और अपना जीवन कृष्ण भजन व भक्ति को समर्पित कर दिया। उनकी यात्रा बताती है कि सच्ची आस्था धर्म और जाति की सीमाओं से परे होती है।

अलीबख़्श का जीवन आस्था, समर्पण और सांप्रदायिक सौहार्द की एक ऐसी मिसाल है, जो लोगों को बरबस ही प्रेरित करती है। मुस्लिम परिवार में जन्म लेने के बावजूद उनका मन शुरू से ही भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति की ओर झुका रहा। यही झुकाव आगे चलकर उनके जीवन की सबसे बड़ी पहचान बन गया।

बचपन से ही कृष्ण की ओर खिंचाव

अलीबख़्श का मन बचपन से ही श्रीकृष्ण की ओर आकर्षित रहा। जिस उम्र में बच्चे खेल-कूद में रमते हैं, उस समय उनके भीतर भगवान कृष्ण के प्रति एक अनोखा लगाव पनप रहा था। समय बीतने के साथ यह आकर्षण और गहरा होता गया और धीरे-धीरे गहरी श्रद्धा तथा आध्यात्मिक समर्पण का रूप ले बैठा।

जीवन कृष्ण भक्ति को समर्पित

अलीबख़्श ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा कृष्ण भजन, पूजा-पाठ और भक्ति मार्ग को समर्पित कर दिया। उनके लिए यह केवल एक परंपरा या रिवाज नहीं, बल्कि मन की गहराई से उपजा प्रेम था, जो ईश्वर के प्रति उनकी अटूट निष्ठा को दर्शाता है।

भक्ति की कोई सीमा नहीं

अलीबख़्श की यह यात्रा इस बात की गवाही देती है कि सच्ची भक्ति किसी धर्म, जाति या सामाजिक दायरे में बंधी नहीं होती। यह तो मन की आस्था और ईश्वर के प्रति प्रेम का विषय है, जो हर बंधन से ऊपर है।

मानवता और एकता की प्रेरणा

उनकी कहानी उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो मानवता, प्रेम और आध्यात्मिक एकता में विश्वास रखते हैं। अलीबख़्श का जीवन यह संदेश देता है कि आस्था का असली रूप दिलों को जोड़ने में है, न कि दीवारें खड़ी करने में।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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