राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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36000 फीट की ऊंचाई पर मचा हड़कंप
फुकेत से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की फ्लाइट AI2379 के साथ 4 अगस्त को हुई घटना ने विमानन जगत में हलचल पैदा कर दी है। आसमान में 36000 फीट की ऊंचाई पर उड़ रहे इस विमान में अचानक ऐसा कुछ हुआ, जिसने न केवल यात्रियों में दहशत फैला दी बल्कि विमान को 300 फीट नीचे गोता लगाने पर मजबूर कर दिया। इस हादसे में कुल 20 यात्री और 4 क्रू मेंबर घायल हुए। शुरुआत में इसे केवल एक सामान्य टर्बुलेंस यानी हवा का झोंका माना जा रहा था, लेकिन जैसे-जैसे इस मामले की परतें खुल रही हैं, इसके पीछे की कहानी कहीं अधिक चिंताजनक और गंभीर नजर आ रही है।
वह एक मिनट जो पूरी जांच का केंद्र है
इस पूरी घटना की जांच का सारा दारोमदार सुबह 9:32 बजे के उस एक मिनट पर टिका है। तकनीकी रिकॉर्ड्स बताते हैं कि उड़ान के दौरान शुरुआती ढाई घंटे से अधिक समय तक सब कुछ सामान्य था और कोई बड़ी चेतावनी दर्ज नहीं हुई थी। हालांकि, 9:32 बजे का वह एक मिनट विमान के इतिहास में दर्ज होने वाली तमाम तकनीकी समस्याओं की शुरुआत बन गया। इस एक मिनट के अंतराल में कई सिस्टम अलर्ट एक साथ सामने आए। इसमें मुख्य रूप से हाइड्रॉलिक प्रेशर, ऑटोपायलट डिस्कनेक्ट, एलिवेटर फॉल्ट और हाइड्रॉलिक सिस्टम या टैंक लेवल से जुड़े एरर शामिल हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या तकनीकी खराबी के चलते विमान नीचे गया या फिर विमान की अचानक ऊंचाई बदलने के कारण ये सिस्टम अलर्ट ट्रिगर हुए?
क्या तीनों हाइड्रॉलिक सिस्टम फेल हो गए थे
इस मामले को लेकर एयरलाइन पायलट एसोसिएशन ऑफ इंडिया यानी ALPA India ने एक बड़ा दावा पेश किया है। संगठन के अध्यक्ष कैप्टन सैम थॉमस का कहना है कि विमान के तीनों हाइड्रॉलिक सिस्टम में समस्या उत्पन्न हो गई थी। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कॉकपिट क्रू ने तत्काल आपातकालीन कदम उठाए। इस दावे के अनुसार, को-पायलट को निर्देश दिया गया था कि वह विमान की नोज को नीचे करे, जिसके कारण विमान 300 फीट नीचे की ओर झुक गया। इस अचानक आई गिरावट के चलते केबिन के अंदर यात्री और क्रू के सदस्य ऊपर की ओर उछल गए, जिससे उन्हें चोटें आईं। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ट्रिपल हाइड्रॉलिक फेलियर का यह दावा फिलहाल आधिकारिक जांच का हिस्सा नहीं है और अंतिम निष्कर्ष आना अभी बाकी है।
तकनीकी पहेली और ब्लैक बॉक्स की भूमिका
जांचकर्ताओं के लिए यह समझना सबसे कठिन चुनौती है कि 'चिकन और एग' जैसी स्थिति में से पहले क्या हुआ। क्या कोई हाइड्रॉलिक सिस्टम फेलियर था जिसकी वजह से विमान की ऊंचाई कम हुई, या फिर विमान के अचानक नीचे जाने से सेंसर में खराबी आई और चेतावनियां शुरू हुईं? इस पहेली का एकमात्र सटीक समाधान ब्लैक बॉक्स के डेटा से मिलेगा। DFDR यानी फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर विमान की गति, पिच, हाइड्रॉलिक पैरामीटर्स और ऑटोपायलट सेटिंग्स के सटीक क्रम का खुलासा करेगा, जबकि CVR यानी कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर यह बताएगा कि 9:32 बजे उस घबराहट भरे पल में पायलटों के बीच क्या संवाद हुआ और उन्होंने किन आधारों पर यह कठिन निर्णय लिए।
घटना के बाद का घटनाक्रम
9:32 बजे के बाद भी विमान के तकनीकी रिकॉर्ड में हलचल जारी रही। रिकॉर्ड्स के अनुसार, 9:33 बजे दाईं ओर के आगे के इमरजेंसी डोर से जुड़े दो संदेश और 9:35 बजे दाईं ओर के पिछले दरवाजे से जुड़ा एक और अलर्ट दर्ज हुआ। इसके बाद करीब 41 मिनट तक कोई भी नई एंट्री रिकॉर्ड नहीं हुई। शांति का यह दौर 10:16 बजे टूटा जब इंजन नंबर-1 के एंटी-आइस सिस्टम से जुड़ी चेतावनी सामने आई। इसके ठीक 36 मिनट बाद 10:52 बजे ऑटोपायलट के फिर से डिस्कनेक्ट होने की सूचना मिली। यह साफ है कि 9:32 की घटना उस दिन की एकमात्र समस्या नहीं थी, बल्कि उसके बाद भी सिस्टम में कई अनसुलझे अलर्ट आते रहे।
पायलट का मेडिकल टेस्ट और गांजे का एंगल
तकनीकी पहलुओं के अलावा इस मामले में मानवीय पहलू ने भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दोनों पायलटों का साइकोएक्टिव सब्सटेंस स्क्रीनिंग टेस्ट किया गया। प्रारंभिक रिपोर्ट के मुताबिक, को-पायलट के टेस्ट में कोई विसंगति नहीं मिली, लेकिन मुख्य कैप्टन के सैंपल की जब कन्फर्मेटरी लैब में जांच हुई, तो वह मारिजुआना के लिए पॉजिटिव पाया गया। सूत्रों का कहना है कि मुख्य पायलट इस स्तर पर नशे में था कि वह विमान को संभालने की स्थिति में नहीं था। यह तथ्य सुरक्षा के दावों पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। अब जांच एजेंसी इन सभी कड़ियों को जोड़कर यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या नशा और तकनीकी गड़बड़ी का आपस में कोई संबंध है। फिलहाल, 9:32 बजे के उस एक मिनट की फुटेज और डेटा ही इस हादसे का असली सच दुनिया के सामने ला पाएंगे।
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