क्या ईरान भी 'मक्का पैक्ट' में होगा शामिल? ईरानी विदेश मंत्रालय ने स्थिति की साफ विश्व 3 घंटे पहले 5
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए रक्षा समझौते में ईरान के शामिल होने की चर्चाएं तेज हैं। इस पर ईरानी विदेश मंत्रालय ने अपना आधिकारिक रुख स्पष्ट किया है।

मक्का समझौते पर ईरान का आधिकारिक रुख

हाल ही में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुए मक्का समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चा हो रही है। इस त्रिपक्षीय गठबंधन में ईरान के जुड़ने की संभावनाएं भी जताई जा रही थीं। इन अटकलों पर विराम लगाते हुए ईरान के विदेश मंत्रालय ने अपनी स्थिति साफ की है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने एक प्रेस वार्ता के दौरान स्पष्ट किया कि ईरान को मक्का समझौते में शामिल होने के लिए अभी तक कोई आधिकारिक निमंत्रण प्राप्त नहीं हुआ है। हालांकि, उन्होंने यह जरूर कहा कि इन देशों के साथ क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मसलों पर बातचीत करने के लिए कुछ प्रस्ताव साझा किए गए हैं। इस्माइल बकाई के शब्दों में, ईरान को समझौते में निमंत्रण नहीं मिला है, लेकिन संबंधित देशों के साथ मिलकर क्षेत्रीय सुरक्षा पर चर्चा करने की पहल जरूर की गई है।

तीन देशों के बीच रक्षा सहयोग का ढांचा

यह महत्वपूर्ण रक्षा समझौता 7 अगस्त को मक्का में संपन्न हुआ था। इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वालों में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ शामिल थे। इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य तीनों देशों के बीच आपसी रक्षा सहयोग को बढ़ाना और एक सामूहिक प्रतिरोध प्रणाली को विकसित करना है। समझौते के आधिकारिक बयान में यह उल्लेख किया गया है कि यदि इन तीन देशों में से किसी पर भी सशस्त्र हमला होता है, तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। हालांकि, इस दस्तावेज़ में सैन्य अभियानों या ऑपरेशनल प्रतिबद्धताओं के बारे में विस्तार से जानकारी नहीं दी गई है, लेकिन यह भविष्य में रक्षा सहयोग के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है। इसका व्यापक उद्देश्य इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता को कायम रखना है, जो कि वर्तमान में पश्चिम एशिया में बढ़ती भू-राजनीतिक चुनौतियों और तनाव के बीच अत्यंत आवश्यक है।

गठबंधन की पहली बड़ी परीक्षा और चुनौतियां

ईरानी प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने इससे पहले अगस्त महीने में इस त्रिपक्षीय समझौते को लेकर एक टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि यह गठबंधन क्षेत्रीय सोच में आए एक बड़े बदलाव को दर्शाता है। बकाई का मानना है कि मिडिल-ईस्ट के देशों को अब यह समझ आ गया है कि सुरक्षा को किसी बाहरी दलाल के जरिए खरीदा नहीं जा सकता है। दूसरी ओर, जेरूसलम पोस्ट में प्रकाशित एक विश्लेषण में इस गठबंधन की प्रभावशीलता पर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यह समूह अपनी शुरुआती चुनौतियों को संभालने में कमजोर नजर आ रहा है। यमन के ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों ने जब जाज़ान स्थित अरामको रिफाइनरी को अपना निशाना बनाया, तब यह नया गठबंधन किसी भी प्रकार की ठोस सैन्य कार्रवाई करने या कड़ा रुख अपनाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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