शंघाई सहयोग संगठन में भारत की सदस्यता का सफर: आखिर क्यों भारत ने काफी समय तक 'वेट एंड वॉच' की नीति अपनाई? विश्व एक घंटा पहले 7
शंघाई सहयोग संगठन दुनिया का एक प्रभावशाली क्षेत्रीय मंच है, जिसमें चीन, रूस, भारत और पाकिस्तान जैसे प्रमुख देश शामिल हैं। जानिए भारत के इस संगठन से जुड़ने के पीछे के जटिल भू-राजनीतिक समीकरण और इसके दूरगामी प्रभाव क्या हैं।

शंघाई सहयोग संगठन: एक बड़ा यूरेशियाई प्रभाव

क्या आपने कभी शंघाई सहयोग संगठन यानी SCO के बारे में गहराई से जाना है? आने वाले समय में किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में इस संगठन का बड़ा शिखर सम्मेलन आयोजित होने वाला है। यदि हम भौगोलिक स्थिति और जनसंख्या के आंकड़ों पर गौर करें, तो SCO को दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन माना जा सकता है। यह संगठन मुख्य रूप से यूरेशियाई देशों के बीच राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक सहयोग, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा मामलों में एक सेतु की तरह काम करता है। इसके केंद्र में चीन, रूस, भारत और पाकिस्तान जैसे महत्वपूर्ण देश हैं। इसके अलावा, मध्य एशिया और मिडिल ईस्ट के कई देश भी इसके सदस्य के रूप में जुड़े हुए हैं। हालांकि, यह भी सच है कि भारत शुरू से ही इस समूह का हिस्सा नहीं था, बल्कि भारत ने कई वर्षों तक स्थिति को भांपने के लिए 'वेट एंड वॉच' यानी प्रतीक्षा करो और देखो की नीति अपनाई थी। आखिर भारत के इस संकोच के पीछे क्या कारण थे, आइए इसे विस्तार से समझते हैं।

कैसे हुई थी शंघाई फाइव की शुरुआत?

SCO की नींव 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद की परिस्थितियों में छिपी है। उस समय सोवियत संघ के टूटने से कई नए मध्य एशियाई गणराज्य अस्तित्व में आए, जैसे कजाखस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान। इन देशों की सीमाएं रूस और चीन के साथ बेहद लंबी और खुली थीं। उस दौर में सीमा विवादों को हल करना, सैन्य तनाव में कटौती करना और सीमा पार के जातीय अलगाववाद को नियंत्रित करना सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौतियां थीं। इन्हीं गंभीर सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए 1996 में 'शंघाई फाइव' नामक मंच का गठन किया गया, जिसमें चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान शामिल थे।

SCO का स्वरूप और विकास

शुरुआती मंच की सफलता और आपसी विश्वास को देखते हुए सदस्य देशों ने इसके दायरे को सिर्फ सीमा सुरक्षा तक सीमित न रखने का निर्णय लिया। उन्होंने इसे एक व्यापक क्षेत्रीय सहयोग ढांचे में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाए। उज्बेकिस्तान के आधिकारिक रूप से शामिल होने के बाद, 15 जून 2001 को इस समूह का नाम आधिकारिक तौर पर शंघाई सहयोग संगठन (SCO) रखा गया। इसके बाद जून 2002 में SCO चार्टर पर हस्ताक्षर किए गए और सितंबर 2003 से यह पूरी तरह प्रभावी हो गया। इस ढांचे को मजबूती देने के लिए बीजिंग में संगठन का सचिवालय और ताशकंद में क्षेत्रीय आतंकवाद-विरोधी संरचना (RATS) स्थापित की गई।

भारत की सदस्यता में देरी क्यों हुई?

भारत को 2005 में ही SCO में ऑब्जर्वर का दर्जा मिल गया था, फिर भी भारत को पूर्णकालिक सदस्य बनने में जून 2017 तक का लंबा समय लग गया। भारत के इस विलंब के पीछे कई जटिल भू-राजनीतिक कारक और रणनीतिक पेच थे।

  • चीन-रूस शक्ति केंद्र: लंबे समय तक इस संगठन का केंद्र बिंदु रूस और चीन ही रहे। चीन इस बात को लेकर सशंकित था कि भारत को पूर्ण सदस्यता देने से संगठन का आंतरिक शक्ति संतुलन बदल सकता है, जिससे कोई अन्य गुट बनने की संभावना पैदा हो सकती है।
  • भारत का संतुलन: कुछ रणनीतिक जानकारों का मानना था कि SCO एक ऐसा क्लब है जो पूरी तरह रूस और चीन के प्रभाव में है। उन्हें डर था कि यह मंच पश्चिमी देशों के खिलाफ काम कर सकता है, जो भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और भारत की पारंपरिक गुट-निरपेक्ष नीति के सिद्धांतों के विरुद्ध जा सकता था।
  • पाकिस्तान का फैक्टर: जब भारत ने पूर्ण सदस्यता के लिए प्रक्रिया शुरू की, तो बीजिंग ने अपने करीबी दोस्त पाकिस्तान को भी इसी के साथ शामिल करने का दबाव डाला। चीन ने पाकिस्तान की प्रविष्टि को एक सौदेबाजी की तरह इस्तेमाल किया ताकि दक्षिण एशिया में भारत के प्रभाव को संतुलित किया जा सके। इस कूटनीतिक सौदेबाजी के कारण आम सहमति बनने में देरी हुई और अंततः 2017 में अस्ताना शिखर सम्मेलन में दोनों देशों को एक साथ शामिल किया गया।

भारत के शामिल होने के पीछे का उद्देश्य

बाधाओं और पाकिस्तान की मौजूदगी के बावजूद, भारत को यह समझ आ गया था कि इस समूह से बाहर रहने का मतलब अपने पड़ोस में अपनी आवाज को दबा देना होगा। भारत के इस संगठन में शामिल होने के पीछे कई प्रमुख रणनीतिक कारण थे:

  • आतंकवाद से मुकाबला: RATS के माध्यम से भारत को आतंकवाद विरोधी रणनीतियों, खुफिया जानकारी साझा करने और मादक पदार्थों की तस्करी व कट्टरपंथ को रोकने के लिए एक मजबूत क्षेत्रीय मंच प्राप्त हुआ।
  • मध्य एशिया से कनेक्टिविटी: मध्य एशिया तेल, यूरेनियम और गैस जैसे प्राकृतिक संसाधनों का भंडार है। भारत ने इसे अपना 'एक्सटेंडेड नेबर' माना है। इस सदस्यता से भारत को एनर्जी पाइपलाइनों (जैसे TAPI) और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) जैसे व्यापारिक मार्गों को गति देने में मदद मिल रही है।
  • क्षेत्रीय प्रभाव का संतुलन: भारत की सदस्यता यह सुनिश्चित करती है कि मध्य एशिया में केवल चीन ही राजनीतिक, सुरक्षा और आर्थिक एजेंडा तय न करे। यह भारत की मल्टी-अलाइनमेंट नीति के अनुकूल है, जो नई दिल्ली को BRICS और SCO जैसे मंचों पर सक्रिय रहने के साथ-साथ पश्चिमी देशों से भी साझेदारी बनाए रखने की स्वतंत्रता देती है।

आज SCO एक साधारण बॉर्डर मैनेजमेंट मंच से आगे निकलकर यूरेशिया के सबसे बड़े भू-राजनीतिक ब्लॉक के रूप में स्थापित हो चुका है। हालांकि चीन और पाकिस्तान की रणनीतिक जुगलबंदी के चलते शुरुआत में देरी जरूर हुई, लेकिन अपने ऊर्जा गलियारों की सुरक्षा, क्षेत्रीय आतंकवाद पर लगाम और मध्य एशिया में उपस्थिति दर्ज कराने के लिए भारत का SCO में शामिल होने का निर्णय एक ऐतिहासिक कदम साबित हुआ है।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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