कांवड़ यात्रा: गूलर के पेड़ से दूरी क्यों है जरूरी, ज्योतिष से समझें धार्मिक नियम धर्म एक घंटा पहले 2
सावन के पवित्र महीने में कांवड़ यात्रा के दौरान कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य माना जाता है, जिनमें गूलर के पेड़ से दूरी बनाना भी शामिल है।

सावन और कांवड़ यात्रा का महत्व

श्रावण मास पूरी तरह से भगवान शिव की भक्ति और आराधना के लिए समर्पित माना जाता है। इसी पावन महीने में कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से कांवड़ यात्रा की शुरुआत होती है। वर्ष 2026 में यह यात्रा 30 जुलाई 2026 से आरंभ हुई थी। हरिद्वार को देवभूमि का द्वार माना जाता है, जहां से लाखों शिवभक्त गंगाजल लेकर अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान करते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हरिद्वार के गंगाजल से महादेव का अभिषेक करने पर भक्तों को अक्षय पुण्य और फल की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु बोल-बम के जयघोष के साथ इस कठिन यात्रा को पूरा करते हैं।

कांवड़ यात्रा के कठोर नियम

धर्म शास्त्रों के अनुसार कांवड़ यात्रा महज एक यात्रा नहीं, बल्कि एक कठोर साधना है। इस यात्रा के दौरान शुद्धता का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। यात्रा को सफल बनाने के लिए शास्त्रों में कुछ सख्त नियमों का उल्लेख किया गया है, जिनका पालन करना हर कांवड़िये के लिए अनिवार्य होता है। विद्वान ज्योतिषाचार्य पंडित प्रतीक मिश्रपुरी के अनुसार, यात्रा के दौरान कांवड़ को कभी भी सीधे जमीन पर नहीं रखना चाहिए। कांवड़ को हमेशा किसी ऊंचे स्थान, पेड़ की मजबूत टहनियों या लकड़ी के स्टैंड पर ही सहारा देकर रखा जाना चाहिए।

इसके अलावा, यात्रा के दौरान सात्विकता का पालन अत्यंत आवश्यक है। मन में पवित्रता बनाए रखना और ब्रह्मचर्य का पालन करना इस साधना के अभिन्न अंग हैं। यात्रा के दौरान बिना स्नान किए कांवड़ को छूना वर्जित है, क्योंकि ऐसा करने से पूरी साधना का फल नष्ट हो जाता है। साथ ही, किसी भी प्रकार के नशे जैसे बीड़ी, सिगरेट, गुटका, पान मसाला या तंबाकू का सेवन करना पूरी तरह से प्रतिबंधित है।

गूलर के पेड़ से दूरी क्यों जरूरी है

ज्योतिषाचार्य प्रतीक मिश्रपुरी ने यात्रा के दौरान आने वाली बाधाओं और विशेष वर्जनाओं पर प्रकाश डाला है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि कांवड़ यात्रा के दौरान किसी महिला को स्पर्श करना या मन में किसी के प्रति गलत भावना रखना निषेध है। शास्त्रों में यात्रा के मार्ग को लेकर भी विशेष सावधानियां बताई गई हैं। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण नियम गूलर के पेड़ से संबंधित है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कांवड़ यात्रा के दौरान यदि रास्ते में गूलर का पेड़ दिखाई दे, तो उसके नीचे से गुजरना वर्जित माना गया है। ऐसा माना जाता है कि गूलर के फल में सूक्ष्म जीवाणु होते हैं, जो कांवड़ की पवित्रता और साधना को खंडित कर सकते हैं। गूलर के पेड़ के नीचे से गुजरने से यात्रा का फल शून्य होने का खतरा बना रहता है, इसलिए शिवभक्तों को इससे दूर रहने की सलाह दी जाती है।

गलती होने पर क्या करें

यदि कोई कांवड़िया अनजाने में गूलर के पेड़ के नीचे से गुजर जाए, तो घबराने की आवश्यकता नहीं है। इसके लिए शास्त्रों में प्रायश्चित के सरल उपाय बताए गए हैं। ऐसी स्थिति में कांवड़िए को तुरंत एक कदम पीछे हटना चाहिए। इसके बाद मन ही मन भगवान भोलेनाथ का ध्यान करते हुए ओम नमः शिवाय मंत्र का जाप करना चाहिए। इस प्रकार भगवान शिव से क्षमा याचना करने और मंत्रोच्चार के साथ दोबारा यात्रा शुरू करने पर इसका दोष समाप्त हो जाता है और यात्रा पुनः सफल मानी जाती है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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