राजस्थान
2 घंटे पहले
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विचारों
राजस्थान में पंचायती राज और स्थानीय निकायों के चुनावों में महिलाओं को आरक्षण देने का प्रावधान बहुत पहले से किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य समाज में महिलाओं को सशक्त बनाना और उन्हें राजनीति में आगे लाकर सीधे भागीदारी प्रदान करना था। हालांकि, जमीनी स्तर पर इस आरक्षण की जो तस्वीर उभरकर सामने आती है, वह बेहद चिंताजनक है। आज भी राज्य के कई ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में चुनाव तो महिलाएं जीत जाती हैं, लेकिन उनके स्थान पर पंचायत का पूरा कामकाज और प्रशासनिक फैसले उनके पति या परिवार के अन्य पुरुष सदस्य ही लेते हैं। इसी ज्वलंत मुद्दे को लेकर लोकल18 की टीम ने उदयपुर के स्थानीय निवासियों और प्रबुद्ध नागरिकों से बातचीत की और यह जानने का प्रयास किया कि जमीनी स्तर पर महिलाओं की वास्तविक भागीदारी में कितना बदलाव आया है।
'सरपंच पति' का बढ़ता वर्चस्व और सामाजिक पहचान
उदयपुर के वरिष्ठ समाजसेवी कौशल मूंदड़ा ने इस मुद्दे पर चर्चा करते हुए बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में यह स्थिति बहुत लंबे समय से बनी हुई है। उन्होंने कहा कि कई स्थानों पर जब कोई महिला सरपंच के पद पर चुनी जाती है, तो उसके तुरंत बाद उसके पति पंचायत से जुड़े सभी राजकीय और प्रशासनिक कार्यों में सक्रिय हो जाते हैं। इस अवांछित चलन के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में अब 'सरपंच पति' नाम की एक नई और अनौपचारिक पहचान बन गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि पद तो संवैधानिक रूप से महिला के पास सुरक्षित है, लेकिन उस पद की वास्तविक शक्ति और पंचायत की पूरी कमान उनके पतियों के हाथों में सिमट कर रह जाती है।
बैठकों और चैंबर में महिलाओं की उपस्थिति अनिवार्य करने की मांग
बातचीत के दौरान स्थानीय नागरिकों ने इस कुप्रथा को रोकने के लिए सरकार के स्तर पर ठोस कदम उठाने की जरूरत बताई। एक नागरिक ने सुझाव देते हुए कहा कि सरकार और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जो महिला जनप्रतिनिधि चुनाव जीतकर सत्ता में आई है, वह स्वयं ही सभी महत्वपूर्ण बैठकों और अपने सरकारी चैंबर में उपस्थित रहे।
वर्तमान समय में यह देखा जाता है कि महिला सरपंचों के स्थान पर उनके पुरुष प्रतिनिधि या उनके पति बैठकों में जाकर अधिकारियों के साथ चर्चा करते हैं और निर्णय लेते हैं। लोगों का मानना है कि यदि महिलाओं को स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अवसर नहीं मिलेगा, तो उनका राजनीतिक विकास पूरी तरह से रुक जाएगा। इस प्रतिनिधि व्यवस्था पर प्रशासनिक रूप से पूरी तरह रोक लगनी चाहिए।
कार्यालयों तक नहीं पहुंच पातीं महिला जनप्रतिनिधि
ग्रामीण क्षेत्रों के जागरूक लोगों ने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि कई गांवों में स्थिति इतनी खराब है कि महिला सरपंच चुनाव जीतने के बाद एक बार भी पंचायत के कार्यालय (चैंबर) तक नहीं पहुंच पातीं। उनके सारे कामकाज घर के भीतर से ही संचालित होते हैं। पंचायत से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने, सरकारी सील (मोहर) लगाने और अन्य कागजी कार्यों में भी महिला सरपंच के पति या परिवार के अन्य पुरुषों का ही पूरा दखल देखने को मिलता है, जो कि पूरी तरह से गलत है।
महिला आरक्षण के मूल उद्देश्य पर खड़े होते सवाल
स्थानीय लोगों का स्पष्ट कहना है कि महिला आरक्षण का मूल उद्देश्य केवल महिलाओं को चुनाव लड़वाना और उन्हें सिर्फ नाम के लिए जीत दिलाना नहीं था। इसका मुख्य उद्देश्य उन्हें निर्णय लेने की वास्तविक जिम्मेदारी देना और आत्मनिर्भर बनाना था। यदि महिला के नाम पर मिला पद केवल पुरुषों के वर्चस्व को बनाए रखने का साधन बन जाता है, तो आरक्षण का मूल उद्देश्य ही पूरी तरह से समाप्त हो जाता है।
आज भी समाज में पुरुष प्रधान सोच हावी है, जिसके कारण महिलाओं को बराबरी का अधिकार केवल कागजों तक ही मिल पाता है। इस समस्या को दूर करने के लिए न केवल प्रशासनिक कड़ाई की जरूरत है, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी जागरूकता और सोच में बदलाव लाना अत्यंत आवश्यक है ताकि महिलाएं वास्तव में एक स्वतंत्र जनप्रतिनिधि के रूप में अपनी भूमिका निभा सकें।
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