छत्तीसगढ़
एक घंटा पहले
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छत्तीसगढ़ में खरीफ मौसम दस्तक दे चुका है और किसान अब मूंग व उड़द जैसी दलहनी फसलों की बुआई की तैयारी में लग गए हैं। ऐसे समय में कृषि विशेषज्ञ किसानों से बीजोपचार पर खास ध्यान देने की अपील कर रहे हैं। कृषि विज्ञान केंद्र बालोद में कार्यरत पौध रोग वैज्ञानिक डॉ. भूमेश्वरी साहू के मुताबिक, दलहनी फसल की बुआई से पहले बीज उपचार करना बेहद आवश्यक है, क्योंकि इससे फसल को शुरुआती अवस्था में ही गंभीर बीमारियों और कीटों के हमले से बचाया जा सकता है।
भर्री जमीन में पीला मोजेक रोग का खतरा
डॉ. साहू ने बताया कि जिले के कई किसान भर्री जमीन में मूंग और उड़द की खेती करते हैं। इन फसलों पर अक्सर पीला मोजेक रोग का खतरा मंडराता रहता है, जो एक वायरस जनित बीमारी है। यह रोग मुख्य रूप से सफेद मक्खी के जरिए एक पौधे से दूसरे पौधे तक फैलता है। अगर समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई तो यह पौधों की बढ़वार को प्रभावित करता है और उत्पादन में भारी कमी ला सकता है।
कौन-सी दवा से करें बीजोपचार
पौध रोग वैज्ञानिक के अनुसार, इस बीमारी से बचाव के लिए इमिडाक्लोप्रिड (गौचो) जैसी दवा से बीजोपचार किया जा सकता है। यह दवा रस चूसने वाले कीटों को काबू में रखने में कारगर मानी जाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एक किलो बीज के लिए करीब 2.5 ग्राम या 2.5 मिलीलीटर दवा की जरूरत पड़ती है।
बीज उपचार की आसान विधि
डॉ. साहू ने बताया कि बीजोपचार की प्रक्रिया बेहद सरल है। किसान पांच किलो की पॉलीथिन लें और उसमें तीन किलो बीज डालें। इसके बाद बीज की मात्रा के अनुसार इमिडाक्लोप्रिड दवा मिलाकर पॉलीथिन को अच्छी तरह हिलाएं, ताकि हर बीज पर दवा की एक समान परत चढ़ जाए। फिर इन बीजों को छांव में सुखाकर बुआई के लिए तैयार किया जा सकता है। यह काम बुआई से आधे घंटे पहले या एक दिन पहले भी किया जा सकता है।
बीजोपचार न करने पर भारी नुकसान
डॉ. भूमेश्वरी साहू ने आगाह किया है कि अगर किसान बीजोपचार नहीं करते तो बुआई के बाद शुरुआती अवस्था में ही पीला मोजेक रोग का असर दिखने लगता है। दो से तीन पत्तियां निकलने के बाद पौधे कमजोर पड़ने लगते हैं, उनकी बढ़वार रुक जाती है और फूल व दाने बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इसके चलते किसानों को करीब 60 प्रतिशत तक उत्पादन का नुकसान उठाना पड़ सकता है। यही वजह है कि बेहतर पैदावार और सुरक्षित खेती के लिए बीजोपचार को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
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