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एक घंटा पहले
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विचारों
आधुनिक निर्माण तकनीक को चुनौती देता जमुई का यह घर
आज के दौर में जब भी कोई व्यक्ति अपना सपनों का आशियाना बनाने की योजना बनाता है, तो सबसे पहले उसके दिमाग में सीमेंट, सरिया, गिट्टी, बालू और आधुनिक मशीनों का ख्याल आता है। इंजीनियरों द्वारा तैयार किए गए नक्शे और कंक्रीट के स्ट्रक्चर आज के निर्माण की पहचान बन गए हैं। लेकिन बिहार के जमुई जिले में एक ऐसा मकान स्थित है, जिसे देखकर आज के दौर के लोग और इंजीनियर भी हैरान रह जाते हैं। करीब 70 साल पहले निर्मित यह मकान आज भी मजबूती के साथ खड़ा है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस घर के निर्माण में न तो सीमेंट का इस्तेमाल हुआ है और न ही इसमें लोहे के सरियों का जाल बिछाया गया है। तमाम मौसमों और दशकों के बदलावों के बावजूद यह ढांचा आज भी पूरी तरह से सुरक्षित है।
घर पर ही तैयार की जाती थीं ईंटें
जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने वाले अनिल कुमार ने इस पुराने और मजबूत मकान के निर्माण से जुड़े कई रहस्य साझा किए। उनके अनुसार, उस दौर में आज की तरह बाजार से बनी-बनाई सामग्री मंगाने का चलन नहीं था। उस समय मकान बनाना एक बड़ी कला और धैर्य का काम हुआ करता था। ईंटों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए उन्हें बाहर से नहीं मंगवाया जाता था, बल्कि गांव में ही मिट्टी से ईंट तैयार की जाती थी। लकड़ियों को जलाकर भट्ठे में इन ईंटों को खास तरीके से पकाया जाता था, जिससे उनकी उम्र और मजबूती बढ़ जाती थी।
सीमेंट की जगह चूना, सूरती और छोआ का इस्तेमाल
आजकल की तरह दीवारें जोड़ने के लिए सीमेंट और रेत का मिश्रण इस्तेमाल नहीं होता था। उस समय के मिस्त्री निर्माण सामग्री को लेकर बहुत अधिक सतर्क रहते थे। दीवार बनाने के लिए चूना और सूरती के मिश्रण से गारा तैयार किया जाता था। चूना बाजार से मंगाया जाता था, जबकि सूरती घर पर ही बनती थी। पुरानी और टूटी हुई ईंटों को पीसकर उसका जो बारीक डस्ट बनाया जाता था, उसे ही सूरती कहा जाता था। इसके साथ ही गन्ने से गुड़ बनाने की प्रक्रिया के दौरान जो अवशेष बचता था, जिसे छोआ कहा जाता है, उसे इस मिश्रण में मिलाया जाता था। चूना, सूरती और छोआ का यह अनोखा मेल एक बेहद शक्तिशाली और टिकाऊ गारा बनाता था, जो ईंटों को सदियों तक मजबूती के साथ बांधे रखता था।
मिस्त्रियों के हाथों में था असली हुनर
उस दौर में मिस्त्री केवल एक मजदूर नहीं, बल्कि निर्माण कला के विशेषज्ञ माने जाते थे। जमींदार परिवारों द्वारा इन कारीगरों को सालाना आधार पर रखा जाता था। ये मिस्त्री न केवल नए मकानों का निर्माण करते थे, बल्कि समय-समय पर उनकी देखरेख और मरम्मत का जिम्मा भी उन्हीं का होता था। निर्माण कार्य में तेजी लाने की बजाय उस समय टिकाऊपन और मजबूती को प्राथमिकता दी जाती थी। उनकी मेहनत और अनुभव का ही नतीजा है कि सात दशक बाद भी यह मकान अपनी मूल अवस्था में बना हुआ है।
छत बनाने की अनोखी और पारंपरिक पद्धति
इस मकान की छत बनाने का तरीका सबसे ज्यादा दिलचस्प और अद्भुत है। आज की तरह लोहे की जालियां बिछाकर कंक्रीट की ढलाई करने के बजाय, उस समय लकड़ी या लोहे के बीम का उपयोग किया जाता था, जिसे बरगा कहा जाता था। इन बरगों के ऊपर बड़ी आकार वाली ईंटनुमा 'टाली' को व्यवस्थित तरीके से बिछाया जाता था। जब छत का आधार पूरी तरह तैयार हो जाता था, तो उस पर चूना, सूरती और छोआ से बना वही विशेष गारा डाला जाता था। इसके बाद मजदूर घंटों तक उसे हाथों से पीट-पीटकर एकसार करते थे। छत की ढलाई मशीनों के भरोसे नहीं, बल्कि कुशल मजदूरों की मेहनत से होती थी। अनिल कुमार का कहना है कि उनकी छत और दीवारें आज भी उस बीते हुए दौर की बेहतरीन कारीगरी की गवाह हैं। यह मकान केवल ईंट और गारे का ढांचा नहीं है, बल्कि उस युग के हुनर और तकनीक की एक जीती-जागती मिसाल है, जब आज जैसे आधुनिक साधन नहीं हुआ करते थे।
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