भारत
3 घंटे पहले
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विचारों
इस साल पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति को एक बार फिर झकझोर कर रख दिया है। कभी कम्युनिस्टों के अभेद्य माने जाने वाले किले को धराशायी करने वाली ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) आज खुद अपने अस्तित्व की सबसे कड़ी लड़ाई से जूझ रही है। नतीजे आते ही पार्टी के भीतर ऐसी हलचल मची कि TMC के 80 में से 60 विधायकों ने बागी तेवर अपना लिए। विधायकों के बाद सांसद भी पीछे नहीं रहे और 28 लोकसभा सांसदों में से 20 ने अलग होने की घोषणा कर दी।
इस अप्रत्याशित सियासी उथल-पुथल के बीच बंगाल की राजनीति के उन पुराने अध्यायों पर नजर डालना जरूरी हो जाता है, जब ममता बनर्जी ने आज से 28 साल पहले खुद कांग्रेस के खिलाफ झंडा बुलंद करके TMC की नींव रखी थी। जिस पार्टी की शुरुआत ममता ने 1 जनवरी 1998 को की थी, आज वही पार्टी राजनीतिक पतन की ओर बढ़ती दिख रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वे कौन-सी परिस्थितियां थीं, जिन्होंने ममता बनर्जी को कांग्रेस छोड़कर नई राह चुनने पर विवश कर दिया था।
इंदिरा लहर में चमकीं 'दीदी'
ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा 1970 के दशक में कांग्रेस के छात्र संगठन से शुरू हुई थी। एक बेहद साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाली ममता के पास न पैसा था और न ही कोई राजनीतिक संरक्षक। लेकिन उनके पास तीखे तेवर और आम लोगों से सीधे जुड़ने की कला जरूर थी। उनका असली प्रभाव 1984 के लोकसभा चुनाव में सामने आया। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में सहानुभूति की लहर थी। उस चुनाव में ममता ने जादवपुर सीट से कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) के कद्दावर नेता सोमनाथ चटर्जी को मात दे दी। इस ऐतिहासिक जीत ने उन्हें रातोंरात देश के सबसे युवा और चर्चित सांसदों की कतार में खड़ा कर दिया।
आखिर ममता ने क्यों कहा कांग्रेस को अलविदा?
दिल्ली में जहां ममता का कद लगातार ऊंचा हो रहा था, वहीं बंगाल में कांग्रेस और वामपंथ की जमीनी स्थिति देखकर उनके भीतर असंतोष बढ़ता जा रहा था। कांग्रेस से अलग होने के पीछे मुख्य रूप से चार बड़ी वजहें रहीं।
1. कांग्रेस नेताओं की CPI-M से कथित मिलीभगत
ममता का सबसे गंभीर आरोप यह था कि पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस के कई बड़े नेता भीतर ही भीतर सत्ताधारी CPI-M से मिले हुए हैं। वे बंगाल कांग्रेस को 'वामपंथियों की बी-टीम' तक कह दिया करती थीं। उनका मानना था कि ये नेता दिल्ली में अपनी मनमानी चलाने की खातिर बंगाल में सीपीएम के विरुद्ध खुलकर मोर्चा नहीं लेना चाहते।
2. आंदोलन बनाम बंद कमरों की राजनीति
ममता का स्पष्ट मत था कि कम्युनिस्टों के मजबूत संगठन को सिर्फ उग्र और आक्रामक जमीनी आंदोलनों के दम पर ही पराजित किया जा सकता है। इसके विपरीत, बंगाल कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सोमेन मित्रा जैसे नेता बंद कमरों और परंपरागत राजनीति में यकीन रखते थे। कांग्रेस का एक खेमा ममता को 'अनुशासनहीन' करार देता था, जबकि ममता मानती थीं कि बंद कमरों की राजनीति से सीपीएम को कभी हराया नहीं जा सकता।
3. पार्टी के अंदरूनी चुनाव में धांधली का आरोप
साल 1997 में बंगाल कांग्रेस का आंतरिक टकराव अपने चरम पर पहुंच गया। पार्टी के भीतर हुए चुनावों में ममता बनर्जी ने सोमेन मित्रा के खिलाफ अपने प्रत्याशी खड़े किए, लेकिन जीत मित्रा के गुट को मिली। ममता ने आरोप लगाया कि चुनाव में जमकर धांधली और फर्जी मतदान हुआ है। इसी घटना ने उन्हें यह एहसास करा दिया कि कांग्रेस के भीतर रहते हुए वे कभी बंगाल की कमान अपने हाथ में नहीं ले पाएंगी।
4. दिल्ली हाईकमान की अनदेखी
ममता ने कई बार दिल्ली पहुंचकर तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी से अनुरोध किया कि बंगाल में रणनीति बदली जाए। लेकिन हाईकमान ने उनकी बात तवज्जो देने के बजाय पुराने और स्थापित नेताओं पर ही भरोसा कायम रखा। उस समय सोनिया गांधी राजनीति में नई-नई कदम रख रही थीं, लिहाजा केंद्र में कोई ऐसा नेता मौजूद नहीं था जो ममता के असंतोष को शांत कर पाता।
वह घटना जिसने राहें हमेशा के लिए जुदा कर दीं
21 जुलाई 1993 को ममता बनर्जी के नेतृत्व में युवा कांग्रेस ने फर्जी मतदान के विरोध में सचिवालय का घेराव किया था। इस दौरान हुई पुलिस फायरिंग में 13 कार्यकर्ताओं की जान चली गई। ममता इस बात से बेहद आहत थीं कि इतने बड़े हादसे के बाद भी कांग्रेस के बड़े नेताओं ने वामपंथी सरकार के विरुद्ध सख्त रुख नहीं अपनाया। इसी दिन उन्होंने मन ही मन कांग्रेस से अलग होने का फैसला कर लिया था।
दिसंबर 1997 में 'पार्टी विरोधी' बयानों के चलते ममता को कांग्रेस से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, या यूं कहें कि वे खुद ही अलग हो गईं। इसके बाद 1 जनवरी 1998 को अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITMC) का जन्म हुआ। 'तृणमूल' का अर्थ होता है घास की जड़। ममता इसके जरिए यह संदेश देना चाहती थीं कि यह पार्टी बड़े नेताओं की नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े गरीबों की पार्टी है।
बंगाल से कांग्रेस का सफाया, ममता बनीं 'किंग'
ममता बनर्जी के कांग्रेस छोड़ने का असर भारतीय राजनीति पर दूरगामी रहा। उनके अलग होते ही कांग्रेस के तमाम जमीनी और आक्रामक कार्यकर्ता उनके साथ चले गए। नतीजतन कांग्रेस सिमटकर मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे चंद जिलों तक रह गई। साल 2021 के चुनाव में कांग्रेस शून्य पर पहुंच गई और 2026 के हालिया विधानसभा चुनाव में वह महज 2 सीटों तक सिमट कर रह गई है।
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