उत्तर प्रदेश
एक घंटा पहले
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विचारों
खेती में बदलाव की अनूठी कहानी
बहराइच जिले के मिर्जापुर गांव के रहने वाले किसान सियाराम के लिए पारंपरिक खेती का तरीका बीते समय में घाटे का सौदा साबित हो रहा था। कई वर्षों तक सीमित पैदावार और लागत से कम कमाई ने उन्हें अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया। अपनी आय बढ़ाने और खेती को लाभप्रद बनाने की जिज्ञासा के साथ उन्होंने कृषि विशेषज्ञों से संपर्क किया। वैज्ञानिकों की सलाह के बाद उन्होंने एक ऐसा रास्ता चुना, जिसने न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाया, बल्कि उन्हें इलाके का एक सफल किसान भी बना दिया।
वैज्ञानिकों की सलाह और नया नजरिया
सियाराम ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में धान की पैदावार कभी 2 कुंतल, कभी 3 कुंतल तो कभी 5 कुंतल के आसपास ही सिमट कर रह जाती थी। इस कम पैदावार में लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता था, मुनाफे की तो बात ही दूर थी। जब उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों से इस समस्या पर चर्चा की, तो उन्हें एक महत्वपूर्ण सुझाव मिला। विशेषज्ञों ने उन्हें सलाह दी कि बाजार में अलग-अलग किस्म के चावल की मांग और कीमतें अलग-अलग होती हैं। एक ही प्रकार की धान लगाने के बजाय अगर वे कई किस्मों को एक साथ उगाएं, तो जोखिम कम हो जाता है और किसी न किसी किस्म से उन्हें अच्छा बाजार मूल्य मिल जाता है।
18 किस्मों के साथ खेती का कमाल
वैज्ञानिकों की इसी सलाह को मानकर सियाराम ने अपने खेतों में 18 वैरायटी के धान की खेती शुरू करने का साहसी कदम उठाया। पिछले 3 वर्षों से वह लगातार इसी पद्धति का पालन कर रहे हैं। वर्तमान में वह कुल 50 बीघा भूमि पर खेती कर रहे हैं। उन्होंने जिन प्रमुख किस्मों का चयन किया है, उनमें K13 काला नमक, किरन काला नमक, 2064, 2065, पीआर 26, रॉयल भोग, 90 दिन का काला नमक, पीएनआर 381, पीआर 2090 और पीआर 1853 जैसी उन्नत किस्में शामिल हैं। उन्होंने इन सभी धानों की नर्सरी तैयार कर रखी है।
खाद की बचत और बेहतर कमाई
अपनी खेती को और अधिक किफायती बनाने के लिए सियाराम ने आधुनिक तरीकों का भी इस्तेमाल किया है। उन्होंने 40 दिन पहले ढेंचा की जुताई का काम पूरा कर लिया था, जिससे लगभग 30 बीघा क्षेत्र में उर्वरक शक्ति बढ़ गई और उन्हें अलग से रसायनों या खाद की आवश्यकता नहीं पड़ी। इस एकीकृत कृषि पद्धति का परिणाम अब उनकी मेहनत की कमाई के रूप में सामने आ रहा है। सियाराम के अनुसार, इन 18 किस्मों की धान की खेती से वे हर साल आसानी से 3 से 4 लाख रुपए का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं। उनकी यह सफलता अब आसपास के अन्य किसानों के लिए भी चर्चा और प्रेरणा का विषय बनी हुई है।
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