क्या राफेल को मिलेगी टक्कर? स्वीडन ने भारत को दिया दमदार प्रस्ताव, जानें कौन-सा फाइटर जेट कितना ताकतवर राष्ट्रीय राजनीति एक घंटा पहले 2
स्वीडिश रक्षा कंपनी साब ने भारत को फुल टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के साथ ग्रिपेन E लड़ाकू विमान देने की पेशकश की है, जबकि रूस का Su-57 और फ्रांस का राफेल पहले से चर्चा में हैं। जानिए इन फाइटर जेट की ताकत और भारत के विकल्प।

आधुनिक तकनीक से लैस लड़ाकू विमानों के मामले में भारत आज भी काफी हद तक विदेशी आपूर्ति पर टिका हुआ है। इस मोर्चे पर रूस और फ्रांस पर देश की निर्भरता अपेक्षाकृत ज्‍यादा रही है। नई दिल्‍ली ने पेरिस के साथ 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर बड़ी डील की तैयारी की है, लेकिन फ्रांस अब तक सोर्स कोड साझा करने पर सहमत नहीं हुआ है। वहीं रूस ने सोर्स कोड के साथ पांचवीं पीढ़ी का Su-57 देने की पेशकश की है। अब इसी कतार में स्‍वीडन का नाम भी जुड़ गया है।

स्‍वीडन की रक्षा कंपनी साब (Saab) ने भारत को पूर्ण तकनीकी हस्तांतरण के साथ ग्रिपेन E सीरीज का फाइटर जेट उपलब्‍ध कराने का प्रस्‍ताव दिया है। इस स्‍वीडिश विमान को फ्रांस के राफेल का प्रतिद्वंद्वी माना जाता है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद तेज हुई तैयारियां

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने अपने रक्षा विमानन को अपडेट, अपग्रेड और आधुनिक बनाने वाली परियोजनाओं को तेज रफ्तार दे दी है। स्‍वदेशी तकनीक से अगली पीढ़ी (5वीं और 6ठी) के लड़ाकू विमान विकसित करने के लिए AMCA परियोजना शुरू की गई है। इसके साथ ही तात्‍कालिक जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत फ्रांस से 114 राफेल विमान खरीदने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

दूसरी ओर, स्‍टील्‍थ फाइटर जेट के अंतर को पाटने के विकल्‍पों पर भी गंभीरता से विचार हो रहा है, ताकि AMCA के तहत विमान तैयार होने तक भारत के पास पांचवीं पीढ़ी के कम से कम दो से तीन स्‍क्‍वाड्रन मौजूद रहें। इसी कड़ी में रूस ने को-प्रोडक्‍शन और सोर्स कोड साझा करने के साथ Su-57 देने का प्रस्‍ताव रखा है, जबकि फ्रांस राफेल का सोर्स कोड देने पर अब तक राजी नहीं हुआ है।

साब की पेशकश में क्या खास

उच्‍च पदस्‍थ सूत्रों के अनुसार, स्‍वीडिश कंपनी साब इस बारे में भारत से लगातार बातचीत कर रही है। कंपनी ने पुष्टि की है कि वह केवल विमान बेचने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि पूर्ण तकनीकी हस्तांतरण के साथ भारत में उत्‍पादन, रखरखाव, डिजाइन और अपग्रेड की व्‍यापक पेशकश कर रही है।

यह प्रस्‍ताव ऐसे समय आया है जब भारत अपनी वायु शक्ति को मजबूत करने के लिए नए विकल्‍पों पर विचार कर रहा है। इस होड़ में रूस का पांचवीं पीढ़ी का स्‍टील्‍थ फाइटर Su-57 भी लगातार चर्चा में है। रूस लंबे समय से भारत को Su-57 उपलब्‍ध कराने और तकनीकी सहयोग बढ़ाने की मंशा जता चुका है। दोनों ही पक्षों की ओर से सोर्स कोड साझा करने का प्रस्‍ताव भी आया है, जिससे ग्रिपेन-E और Su-57 को लेकर रणनीतिक बहस तेज हो सकती है।

राफेल बनाम ग्रिपेन-E: कौन कितना ताकतवर

फ्रांस निर्मित राफेल एक ट्विन-इंजन 4.5 पीढ़ी का मल्‍टीरोल लड़ाकू विमान है। इसकी सबसे बड़ी खूबी इसकी ओम्‍नीरोल क्षमता है, यानी यह एक ही मिशन में एयर-टू-एयर, एयर-टू-ग्राउंड और टोही जैसे कई काम एक साथ अंजाम दे सकता है। दूसरी ओर साब का JAS 39 ग्रिपेन एक हल्‍का, सिंगल-इंजन मल्‍टीरोल विमान है, जो एयर-टू-एयर, एयर-टू-ग्राउंड और टोही मिशनों में सक्षम है।

इंजन और रफ्तार

राफेल में दो Snecma M88 टर्बोफैन इंजन लगे हैं और यह अधिकतम Mach 1.8 (करीब 1,900 किमी/घंटा) की रफ्तार से उड़ान भर सकता है तथा 50,000 फीट तक की ऊंचाई पर संचालित हो सकता है। वहीं ग्रिपेन E में जनरल इलेक्ट्रिक F414G टर्बोफैन इंजन लगा है, जो 98 kN तक थ्रस्‍ट पैदा करता है। यह विमान अधिकतम मैक-2 (करीब 2,450 किमी/घंटा) की रफ्तार हासिल कर सकता है और इसकी फेरी रेंज लगभग 4,000 किमी है।

हथियार ले जाने की क्षमता

राफेल 9.5 टन तक बाहरी हथियार और पेलोड ले जा सकता है। इसके 14 हार्डपॉइंट्स पर Meteor, MICA, SCALP क्रूज मिसाइल और HAMMER गाइडेड बम समेत कई हथियार लगाए जा सकते हैं। वहीं ग्रिपेन E में 10 हार्डपॉइंट्स हैं, जिन पर 7,200 किलोग्राम तक हथियार और पेलोड ले जाए जा सकते हैं। यह Meteor BVR (Beyond Visual Range) मिसाइल, IRIS-T शॉर्ट-रेंज मिसाइल और 27 मिमी Mauser BK27 कैनन से लैस है।

रनवे और तैनाती

ग्रिपेन की एक बड़ी विशेषता कम दूरी वाले और सीमित सुविधाओं वाले रनवे से उड़ान भरने और उतरने की क्षमता है। साथ ही इसका टर्नअराउंड टाइम बेहद कम है, जिससे युद्धक हालात में इसे तेजी से दोबारा तैनात किया जा सकता है।

रडार और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर

राफेल में Thales RBE2 AESA रडार लगा है, जो लंबी दूरी पर कई लक्ष्‍यों को एक साथ ट्रैक कर सकता है। इसके अलावा SPECTRA इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्‍टम दुश्‍मन के रडार और मिसाइल खतरों की पहचान कर उनसे बचाव में मदद करता है। राफेल में 30 मिमी की GIAT 30 कैनन भी लगी है, साथ ही Front Sector Optronics (FSO/OSF) इंफ्रारेड सर्च एंड ट्रैक सिस्‍टम मौजूद है, जो बिना रडार इस्‍तेमाल किए दुश्‍मन के विमानों का पता लगा सकता है। वहीं ग्रिपेन E में ES-05 AESA रडार, आधुनिक IRST (Infrared Search and Track) सिस्‍टम और उन्‍नत इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट दिया गया है, जो दुश्‍मन विमानों की पहचान, ट्रैकिंग और इलेक्ट्रॉनिक खतरों से बचाव में अहम भूमिका निभाते हैं।

तीन साल में पहला विमान देने का दावा

‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट के अनुसार, साब के अधिकारियों का कहना है कि ग्रिपेन-E दुनिया के सबसे आधुनिक सिंगल इंजन मल्‍टीरोल लड़ाकू विमानों में से एक है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित क्षमताएं, आधुनिक एवियोनिक्‍स, एडवांस सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्‍टम और नेटवर्क सेंट्रिक वॉर ऑपरेशन जैसी विशेषताएं हैं। कंपनी का दावा है कि कॉन्‍ट्रैक्‍ट साइन होने के तीन साल के भीतर पहला विमान भारत को सौंपा जा सकता है।

हालांकि ग्रिपेन-E और Su-57 की श्रेणियां अलग-अलग हैं। ग्रिपेन-E को 4.5 पीढ़ी का हल्‍का और कम लागत वाला बहुउद्देश्‍यीय विमान माना जाता है, जबकि Su-57 रूस का पांचवीं पीढ़ी का स्‍टील्‍थ फाइटर है, जिसे अत्‍याधुनिक हवाई युद्ध, लंबी दूरी के हमले और कम रडार पहचान क्षमता के लिए विकसित किया गया है। राफेल भी ग्रिपेन-E की तरह 4.5 पीढ़ी का विमान है, ऐसे में स्‍वीडन के प्रस्‍ताव से फ्रांस पर दबाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्‍य में फैसला केवल तकनीकी क्षमता के आधार पर नहीं, बल्कि लागत, उत्‍पादन साझेदारी और रणनीतिक जरूरतों को ध्‍यान में रखकर लिया जाएगा।

मेक इन इंडिया है साब का सबसे बड़ा आकर्षण

साब की पेशकश का सबसे बड़ा आकर्षण इसका मेक इन इंडिया और आत्‍मनिर्भर भारत के अनुरूप होना माना जा रहा है। कंपनी का कहना है कि यदि समझौता होता है तो भारत सिर्फ विमानों का खरीदार नहीं रहेगा, बल्कि ग्रिपेन के उत्‍पादन, रखरखाव और अपग्रेड का क्षेत्रीय केंद्र बन सकता है। इससे देश के एयरोस्‍पेस और रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को नई गति मिल सकती है।

भारत और स्‍वीडन के बीच बढ़ते रक्षा संबंध भी इस प्रस्‍ताव को मजबूती दे रहे हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्‍वीडन यात्रा के दौरान स्‍वीडिश वायुसेना के ग्रिपेन विमानों ने उनके विमान को एस्‍कॉर्ट किया था। इसे स्‍वीडन की रक्षा क्षमताओं के प्रदर्शन और भारत के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने की रणनीति के संकेत के रूप में देखा गया।

राफेल, ग्रिपेन E और Su-57 में टक्कर

स्‍वीडिश कंपनी के प्रस्‍ताव के बाद भारत के पास अब दो से ज्‍यादा विकल्‍प हो गए हैं। भारतीय वायुसेना के भविष्‍य के लड़ाकू बेड़े को लेकर चल रही चर्चा में राफेल के साथ-साथ रूस का Su-57 और स्‍वीडन का Gripen E दोनों अहम विकल्‍प बनकर उभर रहे हैं। आने वाले वर्षों में भारत का फैसला केवल एक विमान की खरीद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की दीर्घकालिक रक्षा और औद्योगिक रणनीति को भी दिशा देगा।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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