सूरत में 100 घर गिराने के मामले पर गुजरात हाईकोर्ट सख्त, सरकार से पूछा- क्या नागरिकों के प्रति जिम्मेदारी नहीं है राष्ट्रीय राजनीति 2 महीने पहले 79
सूरत के नारिसनगर में बिना नोटिस के 100 घर तोड़े जाने के मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को जमकर फटकार लगाई है और कार्रवाई को पूरी तरह गैर-कानूनी बताया है।

सूरत तोड़फोड़ मामला और हाईकोर्ट की टिप्पणी

सूरत के नारिसनगर इलाके में 30 मई को हुई तोड़फोड़ की कार्रवाई को लेकर गुजरात हाईकोर्ट ने राज्य सरकार पर तीखे प्रहार किए हैं। इस घटना में बिना किसी पूर्व सूचना या नोटिस के लगभग 100 घरों को मलबे में तब्दील कर दिया गया था। इस मामले पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति निखिल करियल ने राज्य सरकार के रवैये पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि यह कार्रवाई पूरी तरह से गैर-कानूनी है और सरकार को इस पूरे प्रकरण पर अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। अदालत ने तल्ख लहजे में कहा कि क्या सरकार को अपने नागरिकों के प्रति जरा भी जिम्मेदारी का अहसास नहीं है।

जांच के स्तर और अधिकारियों की भूमिका पर सवाल

न्यायमूर्ति निखिल करियल ने इस बात पर नाराजगी जताई कि तोड़फोड़ के इतने बड़े मामले की जांच केवल नगर निगम के अधिकारियों तक ही सीमित क्यों रखी गई। अदालत ने सुझाव दिया कि इस पूरे घटनाक्रम की जांच नगर निगम आयुक्त के स्तर से काफी ऊपर के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा की जानी चाहिए थी। सुनवाई के दौरान पुलिस आयुक्त से भी यह मौखिक सवाल किया गया कि जब घटनास्थल पर डीसीपी रैंक के अधिकारी मौजूद थे, तो इस मामले में कोई औपचारिक शिकायत या जांच क्यों नहीं दर्ज की गई।

निगमायुक्त का हलफनामा और विभागीय कार्रवाई

सूरत नगर निगम के आयुक्त ने अदालत में एक हलफनामा दाखिल किया है। इसमें बताया गया है कि निगम के उप निगमायुक्त द्वारा की गई शुरुआती जांच के बाद यह निष्कर्ष निकला कि मामले की गहराई से पड़ताल जरूरी है, क्योंकि संबंधित अधिकारी स्पष्ट रूप से सच नहीं बोल रहे थे। हलफनामे में यह जानकारी दी गई है कि तोड़फोड़ के दौरान मौके पर उपस्थित रहे 5 अधिकारियों को विभागीय कार्यवाही पूरी होने तक निलंबित कर दिया गया है।

क्या राज्य सरकार को चिंता नहीं है

हाईकोर्ट ने सरकारी वकील से तीखे शब्दों में पूछा कि इस मामले में राज्य सरकार का क्या रुख है। अदालत ने कहा कि यह जांच केवल नगर निगम और उसके अधिकारियों की एक टीम द्वारा की जा रही है, जबकि राज्य को इस मामले में सीधे दिलचस्पी दिखानी चाहिए थी। न्यायमूर्ति ने कहा कि छोटी-मोटी झड़पों पर तो सरकार को फौरन चिंता होती है, लेकिन जब 100 घर गिराए जा रहे थे, तब राज्य सरकार ने इसे लेकर कोई चिंता क्यों नहीं जताई। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि याचिकाकर्ता अदालत नहीं आते, तो शायद इतनी जल्दी जांच रिपोर्ट भी सामने नहीं आती।

भगवान जाने और क्या-क्या हुआ है

सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार की कार्यप्रणाली पर गहरा अविश्वास जताते हुए कहा कि यह कोई एक बार की घटना नहीं हो सकती। जस्टिस करियल ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा, यदि आपके अधिकारियों में इतनी हिम्मत है कि वे बिना सोचे 100 घर गिरा सकते हैं, तो भगवान जाने अब तक आपने ऐसे और क्या-क्या कृत्य किए होंगे जो अभी तक प्रकाश में नहीं आए हैं। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या किसी व्यक्ति का घर गिराया जाना एक दंडनीय अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। इसके अलावा, अदालत ने निगमायुक्त से बेघर हुए उन लोगों के पुनर्वास के लिए ठोस योजना की मांग की है, जो इस अवैध तोड़फोड़ के कारण सड़क पर आ गए हैं।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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