राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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गिरफ्तारी और रिमांड पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय उसके खिलाफ कार्रवाई का लिखित आधार नहीं बताती है, तो ऐसी गिरफ्तारी और उसके बाद की गई न्यायिक रिमांड दोनों ही कानून की नजर में अवैध होंगी। यह मामला उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले से जुड़ा है, जहां मनोज कुमार नाम के एक व्यक्ति ने अपनी अवैध गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा था
मनोज कुमार ने बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी हैबियस कॉर्पस याचिका के जरिए अपनी रिहाई की मांग की थी। सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी मेमो की गहन जांच की और पाया कि उसमें केवल अपराध संख्या का उल्लेख था, लेकिन गिरफ्तारी के वास्तविक आधार का कोई विवरण नहीं दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य' और 'डॉ. राजिंदर राजन बनाम भारत संघ' जैसे महत्वपूर्ण फैसलों के अनुसार, गिरफ्तारी का आधार न बताना संविधान का उल्लंघन है।
मुआवजे पर फिलहाल रोक
हाईकोर्ट ने मनोज कुमार को करीब तीन महीने तक अवैध हिरासत में रखने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया था। साथ ही, राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) द्वारा दाखिल हलफनामे पर भी अदालत ने गहरी नाराजगी जाहिर की थी। हालांकि, अब सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की पीठ ने राज्य सरकार की अपील पर नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने कहा है कि अगली सुनवाई तक 10 लाख रुपये के मुआवजे वाले आदेश पर रोक रहेगी और मामले में यथास्थिति बनी रहेगी।
सरकार ने क्या दी सफाई
सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के वकील ने स्वीकार किया कि गिरफ्तार व्यक्ति को लिखित आधार उपलब्ध नहीं कराए गए थे। सरकार का कहना है कि वह गिरफ्तारी की प्रक्रिया से इनकार नहीं कर रही है, बल्कि केवल मुआवजे की राशि को चुनौती दे रही है। राज्य सरकार ने कोर्ट को यह भी जानकारी दी है कि मामले से जुड़े संबंधित एसएचओ को निलंबित कर दिया गया है।
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