सुल्तानपुर की सियासत का वो दिलचस्प अध्याय, जब मदन मोहन मालवीय के पुत्र गोविंद मालवीय बने थे सांसद उत्तर प्रदेश एक महीने पहले 61
उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले का राजनीतिक इतिहास काफी गौरवपूर्ण रहा है, जिसमें महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के बेटे गोविंद मालवीय के सांसद बनने का किस्सा बेहद खास माना जाता है। हालांकि, उनका कार्यकाल असमय निधन के कारण बीच में ही समाप्त हो गया था, जिससे यहां के चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल गए थे।

सुल्तानपुर की राजनीतिक विरासत

उत्तर प्रदेश का सुल्तानपुर जनपद देश की राजनीति में एक अपना अलग और प्रभावशाली स्थान रखता है। यह वह क्षेत्र है जिसने समय-समय पर बड़े राजनेताओं के भाग्य का फैसला किया है। सुल्तानपुर की मिट्टी ने देश के कई दिग्गज नेताओं को अपनी गोद में बिठाया है और उन्हें संसद तक पहुँचाने का काम किया है। यहाँ की राजनीति का इतिहास गांधी परिवार के साथ भी गहराई से जुड़ा रहा है, लेकिन आज हम आपको एक ऐसे ऐतिहासिक घटनाक्रम से अवगत करा रहे हैं जो देश के महान स्वतंत्रता सेनानी और शिक्षाविद महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के परिवार से संबंधित है। बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि वर्ष 1957 के लोकसभा चुनावों में मदन मोहन मालवीय के सुपुत्र गोविंद मालवीय ने सुल्तानपुर संसदीय सीट से विजय प्राप्त की थी और वे यहाँ की जनता का प्रतिनिधित्व करने दिल्ली पहुँचे थे।

बनारस से सुल्तानपुर तक का सफर

सुल्तानपुर के वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह इस ऐतिहासिक घटना को याद करते हुए बताते हैं कि उस दौर में महामना मदन मोहन मालवीय के बेटे का सुल्तानपुर से चुनाव लड़ना और जीतना जिले के लिए गौरव का विषय था। गोविंद मालवीय मूल रूप से बनारस से ताल्लुक रखते थे, लेकिन उन्होंने 1957 के आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के रूप में सुल्तानपुर का रुख किया। उस समय वे अपनी आयु के अंतिम दौर में थे, बावजूद इसके उन्होंने सुल्तानपुर की जनता के साथ सीधा संवाद स्थापित किया। उनकी सक्रियता और जनता के बीच उनकी पैठ ने उन्हें एक बड़ी चुनावी जीत दिलाई और वे सांसद के रूप में निर्वाचित होकर संसद पहुँचे।

सांसद रहते हुए हुआ निधन

गोविंद मालवीय का संसद सदस्य के रूप में कार्यकाल बेहद अल्पकालिक साबित हुआ। उनके सांसद बनने के लगभग 2 से 3 साल के भीतर ही अचानक उनका निधन हो गया। सुल्तानपुर के संसदीय इतिहास में यह पहली ऐसी दुखद घटना थी जब किसी मौजूदा सांसद ने अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही दुनिया को अलविदा कह दिया हो। उनके निधन के बाद सुल्तानपुर की राजनीति में एक बड़ी रिक्तता पैदा हो गई, जिसे भरने के लिए चुनाव आयोग को उपचुनाव की घोषणा करनी पड़ी।

उपचुनाव और जनता का रुख

वर्ष 1960-61 के दौरान सुल्तानपुर में लोकसभा का उपचुनाव कराया गया। इस चुनाव में देश के प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों में से एक, गोविंद बल्लभ पंत के बेटे केसी पंत को कांग्रेस की ओर से प्रत्याशी बनाया गया था। हालांकि, सुल्तानपुर की जनता ने एक बड़ा संदेश देते हुए केसी पंत को पराजित कर दिया। इस हार ने स्पष्ट कर दिया था कि सुल्तानपुर के मतदाता बाहरी चेहरों की तुलना में अपने स्थानीय नेताओं को अधिक महत्व देने लगे थे।

बदलते समीकरण और बाबू गणपत सहाय

उपचुनाव में केसी पंत की पराजय के बाद सुल्तानपुर की राजनीतिक दिशा बदल गई। स्थानीय लोगों ने बाहरी उम्मीदवारों को दरकिनार कर अपने बीच के नेता को चुनने का मन बनाया। इस क्रम में बाबू गणपत सहाय का नाम प्रमुखता से उभर कर सामने आया। बाबू गणपत सहाय ने उस समय कांग्रेस से बगावत की थी, लेकिन उनकी स्थानीय पकड़ और प्रभाव इतना अधिक था कि कांग्रेस को अंततः उन्हें पुनः पार्टी में शामिल करना पड़ा। इसके बाद 1962 के आम चुनावों में कांग्रेस ने गणपत सहाय के बेटे को टिकट देकर मैदान में उतारा और एक बार फिर इस सीट पर पार्टी ने जीत दर्ज की। इस तरह गोविंद मालवीय के निधन के बाद शुरू हुआ यह राजनीतिक सफर सुल्तानपुर के स्थानीय नेतृत्व की मजबूती के साथ आगे बढ़ा।

चेतन तिवारी पाबना के उत्तर प्रदेश संवाददाता हैं और राज्य की राजनीति, प्रशासन तथा जमीनी मुद्दों को कवर करते हैं। लखनऊ में रहते हुए वे जिलों से लेकर विधानसभा तक की खबरें संतुलित रिपोर्टिंग के साथ पाठकों तक पहुंचाते हैं। आम लोगों के मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर उनका खास फोकस रहता है।

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