भारतीय नौसेना के ‘ब्लू-वाटर नेवी’ बनने की अनकही दास्तान: सीमित संसाधनों से लेकर परमाणु पनडुब्बियों और ब्रह्मोस तक का ऐतिहासिक सफर भारत एक घंटा पहले 6
आजादी के समय बेहद कम संसाधनों से शुरुआत करने वाली भारतीय नौसेना आज दुनिया की सबसे ताकतवर समुद्री सेनाओं में से एक बन चुकी है। पूर्व कमोडोर सी.डी. बालाजी से जानिए कैसे रणनीतिक फैसलों, अद्वितीय शौर्य और तकनीकी विकास ने नौसेना का चेहरा पूरी तरह बदल दिया।

15 अगस्त 1947 को जब भारत को स्वतंत्रता मिली, तब नवजात राष्ट्र के सामने केवल शासन व्यवस्था और देश के एकीकरण की ही चुनौती नहीं थी। हमारी विशाल समुद्री सीमाओं और सामरिक हितों की सुरक्षा के लिए एक सक्षम व आधुनिक नौसेना का गठन करना भी उतनी ही बड़ी चुनौती थी। विभाजन की विभीषिका के दौरान भारतीय नौसेना के संसाधनों का भी बंटवारा करना पड़ा, जिसमें देश के कई रणनीतिक नौसैनिक अड्डे और महत्वपूर्ण युद्धपोत पाकिस्तान के हिस्से में चले गए। इस विकट परिस्थिति और सीमित संसाधनों के बावजूद भारत ने एक ऐसी समुद्री ताकत बनने की यात्रा शुरू की, जो आज विमान वाहक पोतों, स्टील्थ गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर्स, परमाणु पनडुब्बियों और अत्याधुनिक नौसैनिक विमानन तकनीक से पूरी तरह सुसज्जित है।

भारतीय नौसेना का यह गौरवशाली सफर केवल नए युद्धपोतों को शामिल करने या जंग जीतने तक सीमित नहीं रहा है। यह दशकों के कड़े परिश्रम, महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों, अभूतपूर्व चुनौतियों पर विजय पाने और क्रांतिकारी तकनीकी बदलावों की एक असाधारण गाथा है। इस पूरी विकास यात्रा और भविष्य की रणनीतियों को गहराई से समझने के लिए सेवानिवृत्त कमोडोर सी.डी. बालाजी ने नौसेना के ऐतिहासिक मील के पत्थरों और उसकी बढ़ती ताकत पर विस्तार से चर्चा की है।

कोस्टल फोर्स से ब्लू-वाटर नेवी तक का सफर: विकास के तीन बड़े चरण

सेवानिवृत्त कमोडोर सी.डी. बालाजी के अनुसार, आजादी के तुरंत बाद हमारे पास बहुत कम बुनियादी सुविधाएं बची थीं क्योंकि अधिकांश प्रमुख नौसैनिक ठिकाने पाकिस्तान के नियंत्रण में चले गए थे। इसके बावजूद, भारतीय नौसेना ने बहुत कम समय में एक तटीय सुरक्षा बल से 'ब्लू-वाटर नेवी' यानी गहरे समंदर में लंबे समय तक ऑपरेशन चलाने में सक्षम सेना के रूप में खुद को स्थापित किया। आज भारतीय नौसेना विमान वाहक पोतों, परमाणु पनडुब्बियों और अत्याधुनिक युद्धपोतों का बेड़ा संभाल रही है। इस बदलाव को मुख्य रूप से तीन ऐतिहासिक चरणों में देखा जा सकता है:

  • पहला चरण (1947 से 1960 के दशक की शुरुआत): आजादी के बाद भी अप्रैल 1958 तक भारतीय नौसेना की कमान ब्रिटिश अधिकारियों के हाथों में रही। इसके बाद एडमिरल रामदास कटारी भारत के पहले स्वदेशी नौसेना प्रमुख बने। जनवरी 1950 में भारत के गणतंत्र बनने के साथ ही नौसेना के नाम से ब्रिटिशकालीन 'रॉयल' शब्द को हटा दिया गया। इस शुरुआती दौर में भारत ने ब्रिटिश नौसेना से कुछ पुराने जहाज खरीदे, जिनमें क्रूजर आईएनएस दिल्ली, 1957 में आईएनएस मैसूर और 1961 में आईएनएस विक्रांत शामिल थे। आईएनएस विक्रांत के आने से भारत एशिया में विमान वाहक पोत संचालित करने वाली एक बड़ी सैन्य शक्ति बनकर उभरा।
  • दूसरा चरण (1965 से 1971): वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में नौसेना की भूमिका मुख्य रूप से सुरक्षात्मक थी। इस युद्ध के बाद नौसेना ने अपनी रणनीतिक कमियों का बारीकी से विश्लेषण किया और अपनी सतह, पनडुब्बी और विमानन शाखाओं के आधुनिकीकरण पर तेजी से काम शुरू किया। यह समय खुद को अंदरूनी तौर पर मजबूत करने का था।
  • तीसरा चरण (1971 से अब तक): इस दौर में भारतीय नौसेना ने अपनी रक्षात्मक नीति को आक्रामक रणनीति में बदल दिया। 1971 के युद्ध में नौसेना ने कराची बंदरगाह पर भीषण हमला किया और बंगाल की खाड़ी की पूरी तरह नाकेबंदी कर दी। इसी चरण में भारत ने अपने बेड़े का 'ब्लू-वाटर' विस्तार किया। हमने रूस से परमाणु पनडुब्बी आईएनएस चक्र लीज पर ली, यूनाइटेड किंगडम से आईएनएस विराट खरीदा और बाद में रूस से आईएनएस विक्रमादित्य को अपने बेड़े का हिस्सा बनाया। इसके साथ ही देश में स्वदेशी जहाज निर्माण को बढ़ावा दिया गया।
नौसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल युद्धपोतों को खरीदना नहीं, बल्कि देश के भीतर ही डिजाइन, सिमुलेशन, परीक्षण और निर्माण का एक आत्मनिर्भर ढांचा तैयार करना था। इसके लिए नौसेना ने इन-हाउस 'नेवल डिजाइन ब्यूरो' की स्थापना की। इसके बाद मुंबई में मझगांव डॉक्स, कोलकाता में गार्डन रीच शिपबिल्डर्स, गोवा शिपयार्ड और हिंदुस्तान शिपयार्ड जैसे स्वदेशी रक्षा शिपयार्ड्स को विकसित किया गया। जहाजों के निर्माण के साथ-साथ उनके रख-रखाव के लिए नौसेना के डॉकयार्ड्स को भी अत्यधिक सक्षम बनाया गया।
- कमोडोर सी.डी. बालाजी (सेवानिवृत्त)

गोवा मुक्ति संग्राम 1961: महज 40 घंटों में औपनिवेशिक सत्ता का अंत

दिसंबर 1961 में गोवा को पुर्तगाली नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए चलाए गए 'ऑपरेशन विजय' में नौसेना की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी, हालांकि इतिहास में इसकी चर्चा कम ही मिलती है। इस ऑपरेशन के तहत नौसेना ने गोवा की समुद्री नाकेबंदी की थी। इस कार्रवाई के दौरान पुर्तगाली फ्रिगेट 'अल्फोंसो डी अल्बुकर्क' को नष्ट कर दिया गया, अंजेदिवा द्वीप को मुक्त कराया गया और दीव में थल सेना को हवाई व गोलाबारी सहायता प्रदान की गई। इस तरह लगभग 450 वर्षों का औपनिवेशिक शासन महज 40 घंटे की सैन्य कार्रवाई में समाप्त हो गया।

इस ऐतिहासिक अभियान में आईएनएस मैसूर, आईएनएस दिल्ली, आईएनएस बेतवा, आईएनएस ब्यास और आईएनएस त्रिशूल जैसे प्रमुख युद्धपोतों ने अपनी ताकत का लोहा मनवाया। अंजेदिवा द्वीप पर पुर्तगाली सैनिकों के कड़े प्रतिरोध का सामना करते हुए भारतीय नौसैनिकों ने द्वीप पर तिरंगा फहराया। वहीं, दीव में सेना को आगे बढ़ाने के लिए आईएनएस दिल्ली ने दुश्मन के रक्षा ठिकानों को नष्ट कर दिया, जिससे पुर्तगाली सेना को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर होना पड़ा।

1971 की जंग: ऑपरेशन ट्राइडेंट और ऑपरेशन पायथन की रणनीतिक जीत

वर्ष 1971 का युद्ध भारतीय नौसेना के इतिहास का सबसे स्वर्णिम अध्याय माना जाता है। इस युद्ध में नौसेना ने अपनी अद्वितीय रणनीतिक सोच का परिचय दिया। कमोडोर सी.डी. बालाजी बताते हैं कि बड़े युद्धपोतों को दुश्मन के रडार आसानी से पकड़ लेते हैं, इसलिए एक बेहद अनोखी रणनीति बनाई गई। भारत के पास सोवियत संघ द्वारा दी गई P-15 मिसाइलों से लैस छोटी मिसाइल नावें थीं। ये नावें इतनी छोटी थीं कि रात के समय रडार की पकड़ में नहीं आती थीं, लेकिन इनकी मारक दूरी कम थी। इसके समाधान के लिए बड़े युद्धपोतों द्वारा इन छोटी मिसाइल नावों को खींचकर दुश्मन के लक्ष्य के करीब ले जाया गया और फिर वहां से उन्हें हमला करने के लिए छोड़ दिया गया।

ऑपरेशन ट्राइडेंट के तहत इन मिसाइल बोट्स ने कराची बंदरगाह पर तबाही मचा दी। इस हमले में पाकिस्तानी विध्वंसक पीएनएस खैबर और माइंसवीपर पीएनएस मुहाफिज को डुबो दिया गया। इस ऐतिहासिक और सफल हमले की याद में हर साल 4 दिसंबर को देश में नौसेना दिवस मनाया जाता है।
- कमोडोर सी.डी. बालाजी (सेवानिवृत्त)

इस बड़े झटके के तुरंत बाद, 8 और 9 दिसंबर को 'ऑपरेशन पायथन' शुरू किया गया, जो दुश्मन पर दोहरा वार करने जैसा था। पहले हमले से कमजोर हो चुके कराची बंदरगाह पर आईएनएस विनाश और अन्य फ्रिगेट्स ने दोबारा धावा बोला और पाकिस्तान के तेल भंडारण टैंकों को निशाना बनाकर उनके 50 प्रतिशत से अधिक तेल भंडार को नष्ट कर दिया।

इस जंग में भारतीय नौसेना को एक बड़ा नुकसान भी झेलना पड़ा। पश्चिमी मोर्चे पर आईएनएस खुकरी दुश्मन के हमले का शिकार हो गया, जिसमें कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला और उनके 176 नाविकों व 18 अधिकारियों की टीम ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। वहीं, पूर्वी मोर्चे पर आईएनएस विक्रांत ने अपने सी हॉक और एलिज विमानों की मदद से पूर्वी पाकिस्तान की पूरी तरह घेराबंदी कर दी और विक्रांत का शिकार करने आई पाकिस्तानी पनडुब्बी पीएनएस गाजी को भी समंदर की गहराइयों में दफन कर दिया गया।

तकनीकी बदलाव: पुराने वैक्यूम ट्यूब रडार से डिजिटल एरा तक

भारतीय नौसेना ने पिछले कुछ दशकों में तकनीक के क्षेत्र में एक बहुत बड़ा बदलाव देखा है। पारंपरिक जहाजों से लेकर आज के अत्याधुनिक स्टील्थ प्लेटफॉर्म तक का सफर काफी चुनौतीपूर्ण रहा है। नई तकनीकों को अपनाने के लिए पूरे बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षण प्रणालियों और डॉकयार्ड्स के आधुनिकीकरण की आवश्यकता थी। डिजिटल तकनीक के इस दौर में उपकरण बहुत तेजी से पुराने हो जाते हैं, इसलिए तकनीक से हमेशा एक कदम आगे रहना जरूरी होता है।

उदाहरण के लिए, नौसेना ने अपने पुराने वैक्यूम ट्यूब रडारों की जगह एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (AESA) रडार अपनाए हैं। पहले जहां तोपों को मैन्युअल तरीके से चलाया जाता था, वहीं आज हमारे पास स्वचालित गाइडेड-मिसाइल प्रणालियां मौजूद हैं। कमोडोर सी.डी. बालाजी बताते हैं कि उन्होंने स्वयं आईएनएस विक्रांत पर फ्रेंच टर्बो-प्रोपेलर विमान 'एलिज' पर काम किया था। एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में उनकी विशेषज्ञता के कारण, नौसेना ने उन्हें एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) में लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA) तेजस के नौसैनिक संस्करण को विकसित करने के लिए भेजा था। वर्ष 2003 में कैबिनेट की मंजूरी मिलने से लेकर 2012 में इसकी पहली सफल उड़ान तक, वह इस परियोजना से सक्रिय रूप से जुड़े रहे।

परमाणु मारक क्षमता और समंदर में सुरक्षा का सुरक्षा चक्र

हिंद महासागर और वैश्विक स्तर पर भारत की भू-राजनीतिक शक्ति को मजबूत करने में नौसैनिक परमाणु क्षमता का बहुत बड़ा योगदान है। वास्तविक सैन्य संतुलन समुद्र के भीतर छिपी पनडुब्बियों से ही बनता है। भारत ने पहले रूस से आईएनएस चक्र को लीज पर लेकर अनुभव हासिल किया, और फिर खुद की परमाणु ऊर्जा से चलने वाली बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत का निर्माण किया। पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को ऑक्सीजन लेने के लिए नियमित रूप से समुद्र की सतह पर आना पड़ता है, जबकि परमाणु पनडुब्बियां महीनों तक पानी के भीतर छिपी रह सकती हैं। यह क्षमता भारत के 'न्यूक्लियर ट्रायड' यानी जमीन, हवा और पानी के नीचे से परमाणु हमला करने की क्षमता को पूरा करती है।

इसके साथ ही ब्रह्मोस मिसाइल के नौसैनिक संस्करण ने भारतीय युद्धपोतों की मारक क्षमता को कई गुना बढ़ा दिया है। ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसकी रफ्तार Mach 3 से भी अधिक है। इतनी तेज गति के कारण दुश्मन के हवाई रक्षा प्रणालियों के लिए इसे रोकना लगभग असंभव होता है। यह मिसाइल 'सी-स्किमिंग' तकनीक पर काम करती है, जिसका अर्थ है कि यह समुद्र की लहरों के बेहद करीब उड़ती है जिससे यह दुश्मन के रडार की नजरों से बच निकलती है। यह मिसाइल हमारे अग्रिम पंक्ति के युद्धपोतों को अचूक हमला करने की ताकत देती है।

साइबर सुरक्षा, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और एआई का बढ़ता दखल

आज के आधुनिक युद्ध क्षेत्र में साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (EW) ने समुद्री रणनीतियों को बेहद जटिल बना दिया है। इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में हर तकनीक का एक काट यानी काउंटर-मेजर होता है। सक्रिय रडार का उपयोग करने पर दुश्मन आपकी स्थिति का पता लगा सकता है, इसलिए पैसिव EW रिसीवर्स की भूमिका आज के समय में बहुत बढ़ गई है। युद्ध से पहले रेडियो और रडार फ्रीक्वेंसी को नियंत्रित करना बेहद महत्वपूर्ण होता है। दुश्मन की मिसाइलों को भटकाने के लिए 'चैफ' और 'फ्लेयर्स' जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, युद्धपोतों के सॉफ्टवेयर और डेटा को साइबर हमलों से सुरक्षित रखना भी एक बड़ी प्राथमिकता बन चुका है।

दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने और वास्तविक समय में निर्णय लेने के लिए सैटेलाइट इमेजरी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है। भारतीय नौसेना आज कंप्यूटर विजन मॉडल्स और ऐसे एल्गोरिदम का विकास कर रही है जो वास्तविक समय में उपग्रहों से प्राप्त होने वाले विशाल डेटा और छवियों को स्कैन करके किसी भी संदिग्ध गतिविधि का तुरंत पता लगा सकें। यह काम पहले मैन्युअल तरीके से किया जाता था जिसमें काफी समय नष्ट होता था। इसके साथ ही, भारतीय वायुसेना (IAF) ने भी प्रोपेलर वाले विमानों से लेकर सुपरसोनिक लड़ाकू विमानों तक का एक लंबा और चुनौतीपूर्ण सफर तय किया है, जिसने देश की रक्षा प्रणाली को अभेद्य बनाया है।

मिशन 2047: पूर्ण रूप से 'आत्मनिर्भर नौसेना' बनने का महासंकल्प

भारतीय नौसेना ने पिछले दशकों में 'बायर्स नेवी' यानी विदेशों से हथियार खरीदने वाली सेना से 'बिल्डर्स नेवी' यानी खुद के जहाज बनाने वाली सेना बनने तक का सफर तय किया है। लेकिन असली लक्ष्य वर्ष 2047 तक, यानी आजादी के 100 साल पूरे होने तक, पूरी तरह से एक 'आत्मनिर्भर नौसेना' बनने का है। वर्तमान में हम 100 प्रतिशत स्वदेशीकरण के लक्ष्य के बेहद करीब हैं, लेकिन कुछ जटिल हिस्से, जैसे नए आईएनएस विक्रांत में लगा जीई एलएम 2500 (GE LM 2500) मरीन गैस टर्बाइन प्रोपल्शन सिस्टम, आज भी आयात किया जाता है। आने वाले समय में हमारा मुख्य ध्यान इन महत्वपूर्ण तकनीकों का पूरी तरह से भारत में निर्माण करने पर केंद्रित है ताकि हमारी नौसेना पूरी तरह से आत्मनिर्भर बन सके।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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