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5 घंटे पहले
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कोटा की कोचिंग में संघर्ष की दास्तां
आमतौर पर कोटा की कोचिंग का नाम आते ही संपन्न परिवारों और बड़े शहरों के बच्चों की तस्वीर दिमाग में उभरती है। लेकिन उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के नवाबगंज कस्बे के रहने वाले अल्ताफ की कहानी इस धारणा को पूरी तरह बदल देती है। अल्ताफ की सफलता यह साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो गरीबी और सीमित संसाधन भी रास्ते की रुकावट नहीं बन सकते। अपने परिवार के साथ सड़क किनारे आलू बेचकर जीवन यापन करने वाले अल्ताफ ने तमाम मुश्किलों को पीछे छोड़कर डॉक्टर बनने का अपना सपना साकार कर लिया है।
आठवीं बार में मिली सफलता
अल्ताफ ने अपनी आठवीं कोशिश में NEET-2026 की कठिन परीक्षा को उत्तीर्ण कर लिया है। इस परीक्षा में उन्होंने 563 अंक प्राप्त किए हैं। उनकी ऑल इंडिया रैंक 27910 रही, जबकि ओबीसी कैटेगरी में उनकी रैंक 13437 दर्ज की गई है। इस मुकाम तक पहुंचने का सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। साल 2019 में उन्होंने पहली बार NEET की परीक्षा दी थी, जिसमें उन्हें केवल 323 अंक मिले थे। इसके बावजूद उन्होंने हौसला नहीं खोया और अपनी तैयारी को जारी रखा।
संघर्ष का सफर और तैयारी के तरीके
शुरुआती दौर में जब कोटा जाने के लिए उनके पास पर्याप्त धन नहीं था, तो उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने कोटा से पढ़ाई करके लौटे अपने दोस्तों से उनके नोट्स लिए और ऑनलाइन उपलब्ध लेक्चर के माध्यम से अपनी तैयारी शुरू की। इस मेहनत का परिणाम यह रहा कि साल 2022 तक उनके अंक बढ़कर 516 हो गए। इसके बाद 2023 और 2024 में उन्होंने 590 अंकों का प्रभावशाली स्कोर हासिल किया, लेकिन उच्च कटऑफ के चलते उन्हें मेडिकल कॉलेज में दाखिला नहीं मिल सका। साल 2025 में उनके अंक गिरकर 501 हो गए थे, लेकिन अल्ताफ ने इन असफलताओं को अपनी जीत की नींव बनाया।
भाई का एक्सीडेंट बना प्रेरणा
अल्ताफ के जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया जब उनके बड़े भाई का एक्सीडेंट हो गया। 12वीं कक्षा पास करने के बाद अल्ताफ अपने पिता के साथ आलू की फड़ पर बैठकर परिवार की मदद करते थे। उनके बड़े भाई रोजाना रात को करीब 2 बजे बरेली मंडी से आलू लाने के लिए जाते थे, इसी दौरान एक रात उनका गंभीर सड़क हादसा हो गया। इस दर्दनाक घटना ने अल्ताफ को झकझोर कर रख दिया और उन्होंने उसी क्षण ठान लिया कि उन्हें डॉक्टर बनकर समाज की सेवा करनी है।
साधारण परिवार और असाधारण जिद
अल्ताफ का परिवार बेहद साधारण और अभावों में जीने वाला रहा है। उनके पिता इकबाल हुसैन केवल नौवीं कक्षा तक पढ़े हैं, जबकि उनकी मां पढ़ी-लिखी नहीं हैं। उनके परिवार में कुल 8 बहनें और 1 बड़ा भाई है। साल 2015 तक परिवार के कुल 12 सदस्य मात्र दो कमरों के घर में रहने को मजबूर थे। पिता पर सभी बेटियों की शादी की जिम्मेदारी का भारी बोझ भी था। इन सबके बावजूद, अल्ताफ ने खुद पैसे जुटाए, मेहनत की और आखिरकार कोटा पहुंचकर अपनी पढ़ाई को वह मुकाम दिया जिसकी बदौलत आज वे डॉक्टर बन चुके हैं। अल्ताफ की यह कहानी उन हजारों छात्रों के लिए एक प्रेरणा है जो कम संसाधनों में भी अपनी आंखों में बड़े सपने संजोए हुए हैं।
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