सिक्किम से मिली सीख दरभंगा में चमकी! युवा किसान आदित्य केंचुआ और जैविक खाद बेचकर कमा रहे दोहरा मुनाफा व्यापार एक घंटा पहले 2
दरभंगा के युवा किसान आदित्य कुमार ने वर्मी कंपोस्ट को व्यवसाय बनाकर अनोखी राह चुनी है। वे एक साथ जैविक खाद और केंचुए दोनों बेचकर हर महीने दोहरी आमदनी अर्जित कर रहे हैं।

रासायनिक खादों और मिलावट से भरी इस दुनिया में अगर शुद्ध अनाज और सब्जी चाहिए तो वर्मी कंपोस्ट सबसे आसान और भरोसेमंद रास्ता है। केमिकल वाली खादें न सिर्फ खेत की उर्वरा शक्ति घटाती हैं, बल्कि हमारे शरीर पर भी प्रतिकूल असर डालती हैं। इसी सोच को आधार बनाकर दरभंगा के प्रगतिशील किसान आदित्य कुमार ने वर्मी कंपोस्ट को अपना कारोबार बना लिया है। आज वे खुद इसका उत्पादन कर दरभंगा सहित आसपास के जिलों तक आपूर्ति कर रहे हैं। हालत यह है कि माँग इतनी ज्यादा है कि उसे पूरा करना मुश्किल हो रहा है।

सिक्किम से मिली प्रेरणा

आदित्य बताते हैं कि वे सिक्किम में एक प्राइवेट नौकरी कर रहे थे। वहाँ उन्होंने देखा कि कोई भी किसान रासायनिक फर्टिलाइजर का इस्तेमाल नहीं करता। सभी वर्मी कंपोस्ट के सहारे ही खेती करते हैं और फसल की गुणवत्ता भी बेहद शानदार रहती है। यही दृश्य देखकर उनके मन में नया विचार आया और वे अपने गाँव लौट आए।

गाँव पहुँचकर उन्होंने सरकार की मदद से वर्मी कंपोस्ट का काम शुरू किया। सबसे पहले इसका इस्तेमाल उन्होंने अपने ही खेत में किया। नतीजा यह रहा कि दूसरी खादों के मुकाबले पैदावार बढ़ी, लागत घटी और मिट्टी भी मुलायम बनी रही।

कैसे तैयार होता है वर्मी कंपोस्ट

आदित्य के अनुसार गाय के गोबर से 20 से 22 दिन में अमोनिया गैस खत्म हो जाती है। इसके बाद उसमें केंचुआ यानी 'वर्म' डाले जाते हैं। ये केंचुए उन्होंने राजस्थान से 4000 रुपये किलो की दर से मँगवाए थे। केंचुए गोबर को खाकर उच्च गुणवत्ता वाला जैविक खाद तैयार करते हैं। यह वर्मी कंपोस्ट बाजार में मात्र 5 से 6 रुपये प्रति किलो की दर से बिकता है।

दोहरी आमदनी का मॉडल

अब आदित्य एक ओर खुद वर्मी कंपोस्ट तैयार कर रहे हैं और दूसरी ओर केंचुए की मांग को देखते हुए वर्म-बेड भी बेच रहे हैं। यानी उन्हें एक साथ दो स्रोतों से कमाई हो रही है — एक खाद की बिक्री से और दूसरी केंचुए की बिक्री से। सब्जी से लेकर अनाज तक हर फसल में इसके प्रयोग से उत्पादन बढ़ता है और इसे खाने वाला भी स्वस्थ रहता है।

रोजगार का बेहतर विकल्प

सरकार जैविक खेती को लगातार बढ़ावा दे रही है। ऐसे में वर्मी कंपोस्ट युवाओं के लिए स्वरोजगार का सुनहरा अवसर बनकर उभरा है। इसमें कम लागत, ज्यादा माँग और पर्यावरण की सुरक्षा — तीनों फायदे एक साथ मिलते हैं।

आदित्य कुमार की यह कहानी संदेश देती है कि अगर मिट्टी को जहर से बचाना है तो केंचुए पालिए। मिलावट के इस दौर में वर्मी कंपोस्ट ही असली अमृत है — खेत के लिए भी और सेहत के लिए भी।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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