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4 घंटे पहले
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विचारों
संघर्ष और ताने बने प्रेरणा
बिहार के पूर्णिया जिले के धमदाहा प्रखंड स्थित चंद्रही गांव के निवासी पंकज कुमार साह ने सफलता की वह कहानी लिखी है जो लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। आज वे असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं, लेकिन इस मंजिल तक पहुंचने का उनका सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा। एक समय था जब गांव के लोग उनकी मां पर तंज कसते थे और सवाल करते थे कि बेटे को इतना पढ़ा-लिखाकर क्या वह उसे प्रोफेसर बना पाएंगी। उन तानों ने पंकज के भीतर एक आग पैदा कर दी थी। उन्होंने तय कर लिया था कि वे इन तानों को चुपचाप नहीं सुनेंगे, बल्कि सफलता हासिल करके उनका मुंह बंद करेंगे।
साधारण परिवार और मां का सपना
पंकज एक बेहद साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके परिवार में चार भाई और एक बहन हैं। आर्थिक तंगी के बावजूद उनके माता-पिता ने बच्चों की शिक्षा से कभी समझौता नहीं किया। पंकज के अनुसार, उनकी मां की सबसे बड़ी इच्छा यही थी कि उनका बेटा उच्च शिक्षा प्राप्त करे और प्रोफेसर बने। गांव में जब लोग उनकी मां को परेशान करते, तो वह चुप रह जाती थीं, लेकिन पंकज उन बातों को महसूस करते थे। उन्होंने अपनी मां के उसी सपने को अपनी जिंदगी का मुख्य लक्ष्य मान लिया था।
मां के निधन के बाद भी नहीं छोड़ी हिम्मत
पंकज की जिंदगी का सबसे दुखद मोड़ तब आया जब उनकी मां का अचानक निधन हो गया। जिस मां ने उनके भविष्य को संवारने के लिए दिन-रात मेहनत की थी, वह उनकी कामयाबी के उस पल को देखने के लिए जीवित नहीं थीं। यह पंकज के लिए किसी बड़े सदमे से कम नहीं था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। मां का सपना अब उनके लिए एक वादा बन गया था जिसे पूरा करना ही था। उन्होंने अपनी मास्टर डिग्री पूरी की और NET परीक्षा की तैयारी में जुट गए। कई बार NET में सफलता मिली, लेकिन अंतिम चयन की प्रक्रिया में उन्हें बाधाओं का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके, पंकज ने अपनी कोशिशें जारी रखीं और हार को अपने पास फटकने नहीं दिया।
नौकरी के साथ पढ़ाई का कठिन संतुलन
संघर्ष के दिनों में पंकज ने अपनी जिम्मेदारियां भी बखूबी निभाईं। उन्होंने पूर्णिया जिला समाहरणालय परिसर में सामान्य प्रशासन विभाग के तहत करीब चार वर्षों तक लिपिक के पद पर कार्य किया। दिन भर की सरकारी नौकरी के बाद भी थकान के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई को कभी नहीं छोड़ा। ड्यूटी से मिलने वाले खाली समय का सदुपयोग वे अपनी तैयारी में करते थे। घर की आर्थिक स्थिति और नौकरी के दबाव के बीच भी उन्होंने अपना लक्ष्य स्पष्ट रखा। उनकी यह मेहनत आखिरकार रंग लाई और असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर उनका चयन हुआ। वर्तमान में वे पूर्णिया विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले रुपौली-बिरौली स्थित कॉलेज में छात्रों को पढ़ा रहे हैं।
शिक्षा के प्रति अब है नया लक्ष्य
पंकज अपनी इस कामयाबी का श्रेय अपनी कठिन मेहनत और माता-पिता के आशीर्वाद को देते हैं। उनका मानना है कि जीवन में कभी भी विषम परिस्थितियों से पीछे नहीं हटना चाहिए। जो ताने कभी उनके लिए पीड़ादायक थे, आज वही उनकी सफलता की गवाही दे रहे हैं। अब पंकज केवल अपनी नौकरी तक ही सीमित नहीं रहना चाहते हैं। उनका इरादा है कि वे अपने गांव और आसपास के क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए काम करें। वे ग्रामीण पृष्ठभूमि के बच्चों को बेहतर मार्गदर्शन देने और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने का सपना देख रहे हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि यदि ग्रामीण क्षेत्र के छात्रों को सही दिशा और अवसर मिले, तो वे भी देश की सबसे ऊंची ऊंचाइयों को छू सकते हैं।
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