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2 घंटे पहले
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शी जिनपिंग के स्वास्थ्य पर उठे सवाल
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के स्वास्थ्य को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और सनसनीखेज दावा सामने आया है। तिब्बत की निर्वासित सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री लोबसांग सांगेय ने हाल ही में एक पॉडकास्ट के दौरान यह दावा किया कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा है। न्यूज एजेंसी एएनआई के साथ बातचीत में उन्होंने खुलासा किया कि शी जिनपिंग को कम से कम दो और संभवतः तीन बार हार्ट स्ट्रोक का सामना करना पड़ा है। लोबसांग सांगेय ने इस जानकारी का स्रोत चीन के एक वरिष्ठ अधिकारी को बताया है, जिनसे उनकी लंबी मुलाकात हुई थी।
गोपनीय मुलाकात और स्वास्थ्य का रहस्य
लोबसांग सांगेय ने बताया कि उनकी मुलाकात चीन के एक बेहद वरिष्ठ अधिकारी के साथ हुई थी, जो एक घंटे से अधिक समय तक चली। इस दौरान उन्होंने नाम न उजागर करने की शर्त पर यह जानकारी साझा की कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के स्वास्थ्य में भारी गिरावट आई है। दावा यह भी है कि शी जिनपिंग का अचानक तीन से पांच सप्ताह के लिए सार्वजनिक जीवन से गायब हो जाना इसी स्वास्थ्य समस्या का परिणाम था। जब वह दोबारा जनता के सामने आए, तो लोगों ने उनके चलने के तरीके और चेहरे के हाव-भाव में स्पष्ट बदलाव देखे थे। हालांकि, जानकारों का यह भी मानना है कि बढ़ती उम्र और शासन का भारी तनाव भी उनके स्वास्थ्य में इस गिरावट का कारण हो सकता है।
चीन में सत्ता का केंद्रीकरण और प्रशासनिक बदलाव
चीन के भीतर हाल के दिनों में कई उच्च स्तरीय सैन्य और प्रशासनिक अधिकारियों को हटाए जाने की खबरें सामने आई हैं। इन बदलावों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई तरह की चर्चाएं गर्म हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इन निर्णयों के पीछे शी जिनपिंग का सत्ता पर अपनी पकड़ को और अधिक मजबूत करने का प्रयास है। मौजूदा स्थिति ऐसी है कि शी जिनपिंग के बेहद करीबी अधिकारी, जैसे कि उनके सुरक्षा प्रमुख और चीफ ऑफ स्टाफ, कई वरिष्ठ मंत्रियों से भी अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं। यह सत्ता के पूर्ण केंद्रीकरण की ओर इशारा करता है, जो चीन के राजनीतिक ढांचे में बड़े बदलाव का संकेत है।
उत्तराधिकारी का सवाल और भविष्य की अनिश्चितता
चीन के भविष्य को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि शी जिनपिंग के बाद चीन की बागडोर किसके हाथ में होगी। लोबसांग सांगेय ने इस मुद्दे पर चर्चा करते हुए बताया कि चीन में फिलहाल शी जिनपिंग के किसी स्पष्ट उत्तराधिकारी की घोषणा नहीं की गई है। इसके पीछे एक गहरा राजनीतिक तर्क हो सकता है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें, तो किसी भी शासक के लिए अपना उत्तराधिकारी घोषित करना एक दोधारी तलवार की तरह होता है। यदि उत्तराधिकारी को बहुत अधिक शक्तियां मिल जाएं, तो वह मौजूदा नेता के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, यदि कोई उत्तराधिकारी तय नहीं किया जाता है, तो भविष्य में सत्ता हासिल करने के लिए संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होना तय है।
माओ जेदोंग जैसा कद और कठोर रवैया
तिब्बत और चीन के संदर्भ में शी जिनपिंग की नीतियों में बदलाव की संभावना बहुत कम नजर आती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि शी जिनपिंग इतिहास में खुद को माओ जेदोंग से भी बड़े और शक्तिशाली नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। उनके नाम को चीन के संविधान में शामिल किया जाना इसी महात्वाकांक्षा का प्रमाण है। शी जिनपिंग के निजी अनुभव भी उनके शासन के तौर-तरीकों को प्रभावित करते हैं। उनके पिता स्वयं एक उदारवादी नेता थे, जिन्हें राजनीतिक अस्थिरता के दौरान कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। इसी अनुभव से शी ने यह सीख ली कि सत्ता में बने रहने के लिए अत्यंत कठोर, सख्त और आक्रामक होना अनिवार्य है। यही कारण है कि वे किसी भी व्यक्ति को अपने रास्ते से हटाने में जरा भी संकोच नहीं करते, जो उनकी सत्ता को चुनौती देने की हिम्मत रखता है।
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