आगरा की बेटी का कमाल: 250 वर्ग फुट की दुकान से खड़ा किया 180 आउटलेट्स का विशाल साम्राज्य व्यापार एक दिन पहले 11
आगरा की रहने वाली नीलम सिंह ने अपनी बचत से 'द बर्गर कंपनी' की शुरुआत की और आज बिना किसी बाहरी फंडिंग के इसे 180 से अधिक स्टोर्स तक पहुँचा दिया है।

कॉर्पोरेट नौकरी से अपना व्यवसाय तक का सफर

सफलता हर किसी के जीवन में रातों-रात नहीं आती, इसके पीछे वर्षों की तपस्या और अनुशासन छिपा होता है। आगरा की नीलम सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिन्होंने एक आरामदायक कॉर्पोरेट नौकरी को पीछे छोड़कर शून्य से एक बड़ा व्यावसायिक साम्राज्य खड़ा कर दिया। बेंगलुरु में एक प्रतिष्ठित ऑफिस में काम करते हुए, जहाँ उनके पास एक सुनिश्चित वेतन और सुखद जीवन था, वहीं उनके भीतर खुद का कुछ बड़ा करने की ललक हमेशा बनी रही। वह अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए अपनी छोटी-छोटी जरूरतों का त्याग करती रहीं। अक्सर वह दोपहर का भोजन छोड़ देती थीं या बेहद सस्ता खाना खाकर दिन गुजारती थीं, ताकि पाई-पाई जोड़कर एक पूंजी जुटा सकें। उस समय लोग उनकी कंजूसी पर हैरान होते थे, लेकिन किसी को नहीं पता था कि वह एक बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ रही हैं।

शिक्षा और व्यापार की शुरुआती समझ

आगरा के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी नीलम के पिता एक कॉलेज में प्रधानाचार्य थे। उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद बी.बी.ए. (BBA) किया और फिर हैदराबाद के आई.सी.एफ.ए.आई. (ICFAI) से मार्केटिंग में एम.बी.ए. (MBA) की डिग्री हासिल की। व्यापार में उनकी रुचि कॉलेज के दिनों में ही दिखने लगी थी। कॉलेज फेस्ट के दौरान अपने दोस्तों के साथ मिलकर उन्होंने केवल तीन दिनों के लिए एक फूड स्टॉल लगाया था, जिससे उन्हें एक लाख रुपये का मुनाफा हुआ। इस घटना ने उनके भीतर के उद्यमी को जगा दिया। इसके बाद उन्होंने गुरुग्राम के एक प्रसिद्ध रेस्टोरेंट में तीन महीने की इंटर्नशिप की, जहाँ उन्होंने किचन प्रबंधन, बिलिंग और ग्राहक सेवा की बारीकियाँ सीखीं। पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने जेनपैक्ट में बिजनेस एनालिस्ट के रूप में 5 लाख रुपये के वार्षिक पैकेज पर काम किया और बाद में आई.सी.आई.सी.आई. लोम्बार्ड से भी जुड़ीं।

बचत का दौर और 'द बर्गर कंपनी' की नींव

साल 2014 में नीलम ने नीतेश धनखड़ से विवाह किया, जो खुद कॉर्पोरेट क्षेत्र में कार्यरत थे। शादी के बाद भी उनका सपना नहीं बदला। उन्होंने तय किया कि वह अपने व्यवसाय के लिए किसी से आर्थिक मदद नहीं लेंगी। वर्ष 2014 से 2016 तक उन्होंने अपनी बचत पर पूरा ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने टैक्सी और ऑटो का खर्च बचाने के लिए पैदल चलना शुरू किया और महंगे शौक छोड़ दिए। तीन वर्षों के अथक प्रयासों के बाद, उन्होंने 5 लाख रुपये की बचत कर ली। वर्ष 2016 में उन्होंने कॉर्पोरेट दुनिया को अलविदा कहा। अपने पति नीतेश के सहयोग से, उन्होंने बाजार का गहरा विश्लेषण किया और महसूस किया कि भारत में विदेशी बर्गर ब्रांड्स तो हैं, लेकिन उनमें भारतीय जायके का अभाव है। इसी सोच के साथ 2018 में गुरुग्राम के ग्लोबल फोयर मॉल में 250 वर्ग फुट की छोटी-सी जगह से 'द बर्गर कंपनी' की शुरुआत हुई। इस पर कुल 20 लाख रुपये का खर्च आया, जिसमें उनकी जमा-पूंजी और निजी बचत शामिल थी।

संघर्ष और शुरुआती अनुभव

शुरुआत में नीलम के पास काम संभालने के लिए केवल एक कर्मचारी था। वह स्वयं काउंटर पर बैठकर ऑर्डर लेतीं, बर्गर सर्व करतीं और साफ-सफाई जैसे सभी छोटे-बड़े काम खुद करती थीं। वह हर ग्राहक से फीडबैक लेती थीं। उन्होंने अपने मेन्यू में मखनी बर्गर, तंदूरी बर्गर जैसे देसी नाम रखे और कीमत इतनी रखी जो छात्रों की जेब पर भारी न पड़े, जो केवल 39 रुपये से शुरू होती थी। उनके बर्गर का स्वाद और व्यवहार इतना लोकप्रिय हुआ कि बिना किसी बड़े विज्ञापन के लोगों ने एक-दूसरे को बताना शुरू कर दिया।

महामारी में बदला बिजनेस मॉडल

साल 2020 की कोरोना महामारी ने रेस्टोरेंट उद्योग को बुरी तरह प्रभावित किया, लेकिन नीलम ने इस चुनौती को अवसर में बदल दिया। अक्टूबर 2020 में लॉकडाउन के बाद उन्होंने फ्रेंचाइजी मॉडल अपनाया। उन्होंने उन लोगों को कम लागत में फ्रेंचाइजी देना शुरू किया जिनकी नौकरियां छूट गई थीं। नीलम ने बर्गर के नवाचार और मार्केटिंग को संभाला, जबकि उनके पति नीतेश ने सप्लाई चेन और संचालन का जिम्मा लिया। इस तालमेल से 2023 तक कंपनी के 7 राज्यों में 100 से अधिक आउटलेट खुल गए और टर्नओवर 40 करोड़ रुपये को पार कर गया।

टियर शहरों में विस्तार और भविष्य की योजना

नीलम ने मेट्रो शहरों के बजाए छोटे कस्बों और टियर 2, 3 व 4 शहरों को अपना केंद्र बनाया। असम के गुवाहाटी और छत्तीसगढ़ के जगदलपुर जैसे शहरों में आउटलेट दो महीने में ही मुनाफे में आ गए। 2025 तक आउटलेट्स की संख्या 150 के पार पहुँच गई, जिसमें उत्तर भारत में 80 से अधिक, पश्चिम में 30 से अधिक, दक्षिण में 25 और पूर्व में 15 स्टोर्स शामिल हैं। कंपनी ने 35 फीसदी की सालाना ग्रोथ दर्ज की और 44 फीसदी ग्राहक दोबारा आने लगे। उन्होंने 'टी.बी.सी. पिको' नामक नया फॉर्मेट पेश किया, जो 80 से 100 वर्ग फुट में केवल 8 लाख रुपये से कम खर्च में खुल सकता है। आज 'द बर्गर कंपनी' 180 से अधिक स्टोर्स तक पहुँच चुकी है और वर्ष 2027 तक 250 नए आउटलेट खोलने का लक्ष्य है, जिससे राजस्व 100 करोड़ रुपये के पार ले जाने की योजना है। यह ब्रांड पूरी तरह से बूटस्ट्रैप्ड है, यानी बिना किसी बाहरी फंडिंग के लगातार मुनाफा कमा रहा है।

श्वेता भाटिया पाबना की बिजनेस फीचर लेखिका हैं, जो सक्सेस स्टोरी और कारोबारी फीचर लिखती हैं। उद्यमियों के संघर्ष, नए कारोबारी मॉडल और प्रेरक कहानियों को वे रोचक अंदाज में पेश करती हैं। उनका लेखन पाठकों को प्रेरणा और जानकारी दोनों देता है।

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