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एक घंटा पहले
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मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में आज भी कई ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अपने हाथों के हुनर और स्वाद से अलग पहचान बनाई है। ऐसी ही एक मिसाल हैं सिंधी बस्ती इलाके में रहने वाली 65 वर्षीय दया बाई, जिन्हें लोग प्यार से 'पापड़ वाली दादी' कहकर पुकारते हैं। उम्र भले ही 65 साल हो चुकी हो, लेकिन उनका जोश आज भी जवानों जैसा है।
40 साल से पापड़ बनाने का काम
दया बाई पिछले 40 वर्षों से पापड़ बनाने का काम कर रही हैं। इस काम से उन्हें हर साल 1 से 2 लाख रुपए की कमाई हो जाती है। वे अपने घर के मसालों से ही पापड़ तैयार करती हैं, जिसकी वजह से इनका स्वाद लोगों को खूब भाता है। यही कारण है कि लोग खुद ऑर्डर देकर उनसे पापड़ बनवाते हैं।
कई तरह के पापड़ करती हैं तैयार
दया बाई उड़द, मूंग, गेहूं, चावल, बाजरा, आलू और मैदे से अलग-अलग किस्म के पापड़ तैयार करती हैं। चावल के पापड़, मूंग के पापड़, उड़द के पापड़ और आलू के पापड़ समेत कई वैरायटी उनके यहां बनती हैं। घर के मसालों के इस्तेमाल से तैयार होने वाले ये पापड़ लोगों की पहली पसंद बन चुके हैं।
कमाई नहीं, परंपरा से जोड़ना मकसद
दया बाई का कहना है कि उनका मकसद केवल पैसा कमाना नहीं है, बल्कि लोगों को पुरानी परंपराओं से जोड़कर रखना है। जैसे ही त्योहार आते हैं, वे 12 महीने पापड़ बनाकर लोगों तक पहुंचाती हैं। लोग पर्व के मौके पर इन्हें खरीदते हैं और अपने सगे-संबंधियों को भी भेजते हैं।
मां से सीखा था पापड़ बनाना
सिंधी बस्ती में रहने वाली दया बाई बताती हैं कि पापड़ बनाने का हुनर उन्होंने अपनी मां से सीखा था। पिछले 40 सालों से वे इसी काम के सहारे अपना जीवन-यापन कर रही हैं। उन्होंने 200 रुपए किलो से लेकर 400 रुपए किलो तक पापड़ बेचे हैं।
त्योहारों पर मीठे पकवान भी
त्योहारों के समय दया बाई मीठे पकवान, खाजा, फैनी और कई तरह के आइटम भी बनाकर देती हैं। यही वजह है कि साल के 12 महीने लोग उनके यहां खरीदारी करने आते रहते हैं।
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