मध्य प्रदेश
एक घंटा पहले
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मध्य प्रदेश में किसान खेती के साथ-साथ बड़े पैमाने पर पशुपालन भी करते हैं. आमतौर पर पशुपालन को सिर्फ दूध उत्पादन से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन प्रगतिशील किसानों का मानना है कि दुधारू पशुओं से मिलने वाला गोबर भी आमदनी बढ़ाने का बड़ा जरिया बन सकता है. गोबर से वर्मी कंपोस्ट खाद तैयार कर किसान अतिरिक्त कमाई के साथ-साथ अपनी खेती की लागत भी घटा सकते हैं.
गोबर को बेकार समझकर न फेंकें
प्रगतिशील किसान मनसुख लाल कुशवाहा का कहना है कि ज्यादातर किसान पशुओं के गोबर को बेकार मानकर फेंक देते हैं, जबकि यही गोबर वर्मी कंपोस्ट के रूप में तैयार होकर अच्छी कमाई का साधन बन सकता है. वर्मी कंपोस्ट एक जैविक खाद है, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन में भी सुधार लाती है. इसके इस्तेमाल से किसानों की रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है.
6 पशुओं से कितना गोबर और कितनी खाद
मनसुख लाल कुशवाहा के अनुसार, अगर किसी किसान के पास 6 दुधारू पशु हैं तो प्रतिदिन लगभग 175 किलो गोबर इकट्ठा हो सकता है. इस हिसाब से एक महीने में करीब 52 क्विंटल कच्चा गोबर उपलब्ध हो जाता है. वर्मी कंपोस्ट बनाने की प्रक्रिया में कच्चे गोबर का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा खाद में बदल जाता है, यानी 52 क्विंटल गोबर से हर महीने 20 से 25 क्विंटल वर्मी कंपोस्ट तैयार की जा सकती है.
हर महीने 18 से 20 हजार रुपये की आय
बाजार में वर्मी कंपोस्ट की मांग लगातार बढ़ रही है. जैविक खेती को बढ़ावा मिलने के कारण किसान और बागवानी करने वाले लोग इसे खरीद रहे हैं. अगर वर्मी कंपोस्ट का उचित मूल्य मिले तो किसान हर महीने 18 से 20 हजार रुपये तक की अतिरिक्त आय कमा सकते हैं. इस तरह सालभर में यह कमाई लाखों रुपये तक पहुंच सकती है.
दोहरा फायदा देता है यह व्यवसाय
वर्मी कंपोस्ट इकाई लगाने में भी ज्यादा खर्च नहीं आता. किसान एक बार केंचुओं की व्यवस्था कर लें तो उसी से लगातार खाद तैयार होती रहती है. समय के साथ केंचुओं की संख्या भी बढ़ती जाती है, जिन्हें बेचकर अलग से आमदनी हासिल की जा सकती है. इस तरह किसानों को दोहरा लाभ मिलता है.
लंबे समय तक उपजाऊ रहेगी जमीन
विशेषज्ञों का कहना है कि वर्मी कंपोस्ट सिर्फ आय बढ़ाने का साधन नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाती है. इसके उपयोग से मिट्टी की संरचना बेहतर होती है, नमी धारण करने की क्षमता बढ़ती है और जमीन लंबे समय तक उपजाऊ बनी रहती है. ऐसे में पशुपालक किसान दूध उत्पादन के साथ गोबर का सही उपयोग कर अपनी आय बढ़ाने और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा सकते हैं.
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