राजस्थान
एक घंटा पहले
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विचारों
राजस्थान के शेखावाटी अंचल में बसा सीकर जिला आज देशभर में प्रगतिशील और परंपरा से हटकर खेती करने वाले किसानों के केंद्र के रूप में नई पहचान बना चुका है। इसी कड़ी में जिले की एक साधारण महिला किसान ने कृषि नवाचार के क्षेत्र में ऐसा मुकाम हासिल किया है, जो आज बड़े कॉर्पोरेट घरानों और डिग्रीधारी विशेषज्ञों के लिए भी अध्ययन का विषय बन गया है।
सीकर के झींगर बड़ी गांव की रहने वाली संतोष पचार ने गाजर के उन्नत बीज तैयार करने में ऐसी छाप छोड़ी है कि अब उनका नाम पूरे देश के कृषि जगत में सम्मान के साथ लिया जाता है। पिछले करीब 15 वर्षों से वे परंपरागत और वैज्ञानिक तरीकों को मिलाकर देसी लाल और दुर्लभ काली गाजर के उच्च गुणवत्ता वाले बीज तैयार कर रही हैं। आज उनके बीजों की पहचान सिर्फ राजस्थान तक सीमित नहीं, बल्कि पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश और असम सहित देश के 15 से अधिक प्रमुख राज्यों तक फैल चुकी है।
सामान्य गाजर की खेती से बिल्कुल अलग है यह प्रक्रिया
संतोष पचार बताती हैं कि गाजर के व्यावसायिक और पैतृक बीज तैयार करने की पूरी प्रक्रिया आम गाजर की पारंपरिक खेती से एकदम भिन्न और बेहद पेचीदा होती है। इसके लिए वे हर साल जनवरी के पहले सप्ताह में गाजर की बुवाई शुरू करती हैं और सबसे पहले जड़ों का स्वस्थ उत्पादन लिया जाता है।
इसके बाद खेत से निकली गाजरों में से सबसे बेहतर गुणवत्ता वाली, रोगमुक्त, सुडौल आकार और गहरे एकसमान रंग वाली गाजरों का बारीकी से चयन किया जाता है। चुनी गई इन श्रेष्ठ गाजरों को ऊपरी हिस्से से काटकर वैज्ञानिक तरीके से दोबारा खेत की मिट्टी में रोपा जाता है। इसी पुनर्रोपण से पौधों में फूल आते हैं और बीज तैयार करने की मुख्य प्रक्रिया शुरू होती है। इस अनूठी विधि से बनने वाले बीजों की अंकुरण क्षमता और आनुवंशिक गुणवत्ता बाजार में उपलब्ध हाइब्रिड बीजों से कई गुना बेहतर रहती है।
बीजों की शुद्धता के लिए डेढ़ किलोमीटर की दूरी
बीजों की जेनेटिक शुद्धता और प्राकृतिक मिठास बनाए रखने के लिए संतोष पचार अपने खेतों में कड़ा अनुशासन बरतती हैं। वे लाल गाजर और काली गाजर की फसलों के बीच करीब डेढ़ किलोमीटर की बड़ी आइसोलेशन दूरी रखती हैं, ताकि दोनों अलग-अलग किस्मों के फूलों में आपसी क्रॉस-पॉलिनेशन न हो और उनकी मूल नस्ल पूरी तरह शुद्ध बनी रहे।
बीज उत्पादन की इस पूरी अवधि में उनके खेत पर 3 से 5 कुशल मजदूर लगातार काम करते हैं। फसल पूरी तरह पककर तैयार होने के बाद बीजों की थ्रेसिंग, आधुनिक तरीके से सफाई और ग्रेडिंग की सारी प्रक्रियाएं बेहद सतर्कता के साथ पूरी की जाती हैं।
5 लाख की लागत, सालाना 35 लाख का शुद्ध मुनाफा
आर्थिक गणित की बात करें तो संतोष पचार वर्तमान में करीब 13 बीघा के बड़े कृषि क्षेत्र में गाजर के बीज उत्पादन का यह सफल कार्य कर रही हैं। इतने क्षेत्र से वे हर साल लगभग 18 से 20 क्विंटल (2000 किलोग्राम) तक उच्च श्रेणी के गाजर बीज प्राप्त कर लेती हैं।
देश के बड़े राज्यों के किसानों में इन बीजों की इतनी मांग है कि बाजार में इनका भाव करीब 1100 रुपए प्रति किलोग्राम तक आसानी से मिल जाता है। इस तरह बीज बिक्री से उन्हें सालाना 30 से 35 लाख रुपए तक की शुद्ध आय होती है, जबकि बीज से लेकर मजदूरी तक पूरी खेती में कुल खर्च महज 3 से 5 लाख रुपए ही आता है।
4 फीट लंबी गाजर का रिकॉर्ड और दो बार राष्ट्रपति पुरस्कार
संतोष पचार सिर्फ एक व्यवसायी नहीं, बल्कि एक कृषि वैज्ञानिक की तरह सोचती हैं। वे अपने खेतों में रासायनिक उर्वरकों को पूरी तरह रोककर शत-प्रतिशत जैविक और ऑर्गेनिक तरीके से ही खेती करती हैं। निरंतर चयन विधि और शोध के जरिए उन्होंने एकरूप, बिना रेशे वाली, रसदार और रिकॉर्ड 4 फीट तक लंबी गाजर विकसित करने में भी असाधारण सफलता हासिल की है।
गाजर के बीज उत्पादन और नई किस्मों के विकास में इस अभूतपूर्व योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2013 और फिर वर्ष 2017 में देश के सर्वोच्च ‘राष्ट्रपति पुरस्कार’ (नेशनल इनोवेटिव फार्मर अवार्ड) से सम्मानित किया है। इसके अलावा उन्हें कई राज्य और जिला स्तरीय सम्मान भी मिल चुके हैं। उनकी यह सफलता आज देश की आधी आबादी और ग्रामीण महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता की अद्भुत मिसाल बन चुकी है।
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