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एक घंटा पहले
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विचारों
इतिहास का वह अनोखा युद्ध
दुनिया भर के इतिहास में कई ऐसे युद्ध हुए हैं, जिन्होंने दशकों तक पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। पहले और दूसरे विश्व युद्ध का उदाहरण हमारे सामने है, जिसमें न जाने कितने ही देश तबाह हुए और करोड़ों लोगों ने अपनी जान गंवाई। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मानव इतिहास में एक ऐसी भी लड़ाई हुई है, जो महज 38 मिनट में ही खत्म हो गई थी? यह समय इतना कम है कि आज के दौर में एक टीवी शो का एपिसोड भी इससे लंबा होता है। इस युद्ध को आंग्ल-जांजीबार युद्ध के नाम से जाना जाता है और इसे आधिकारिक तौर पर विश्व का सबसे छोटा युद्ध माना जाता है। आइए जानते हैं कि आखिर ऐसी कौन सी स्थिति बनी थी कि दो शक्तियों के बीच की जंग शुरू होते ही खत्म हो गई।
ब्रिटिश साम्राज्य और गद्दी का विवाद
इस पूरी कहानी की शुरुआत 19वीं सदी के अंतिम दौर में होती है। साल 1890 में ब्रिटेन और जर्मनी के बीच एक संधि हुई थी, जिसके जरिए पूर्वी अफ्रीका के कई हिस्सों का बंटवारा किया गया था। इस समझौते के बाद, आज के तंजानिया का हिस्सा माने जाने वाले जांजीबार द्वीप पर ब्रिटिश प्रभाव पूरी तरह स्थापित हो गया। उस समय जांजीबार का सुल्तान हमद बिन थुवैनी था, जो ब्रिटिश शासन का समर्थक माना जाता था। सब कुछ सामान्य चल रहा था कि तभी 25 अगस्त 1896 को सुल्तान हमद की मृत्यु हो गई। मौत के बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई, क्योंकि उनके भतीजे खालिद बिन बरगश ने ब्रिटिश अधिकारियों की सहमति के बिना ही खुद को जांजीबार का नया सुल्तान घोषित कर दिया।
ब्रिटेन की अवमानना का परिणाम
उस दौर की संधि के नियमों के अनुसार, जांजीबार के सुल्तान की गद्दी पर बैठने के लिए ब्रिटिश कॉन्सुलेट की अनुमति लेना अनिवार्य था। खालिद का यह कदम अंग्रेजों को बिल्कुल भी पसंद नहीं आया और उन्होंने इसे सीधे तौर पर ब्रिटिश साम्राज्य की अवमानना और एक खुली चुनौती के रूप में देखा। ब्रिटिश राजनयिक बेसिल केव ने खालिद बिन बरगश को साफ संदेश भेजकर महल खाली करने और सत्ता से हटने का कड़ा अल्टीमेटम दिया। हालांकि, खालिद अपनी ताकत के घमंड में था और उसने इस चेतावनी को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। सुरक्षा के नाम पर उसने महल के चारों ओर अपने करीब 3000 वफादार सैनिकों को तैनात कर दिया और खुद को शाही महल की चारदीवारी के अंदर सुरक्षित महसूस करने लगा। खालिद को शायद यह गलतफहमी थी कि अंग्रेज केवल डराने का खेल खेल रहे हैं और वे कभी भी सीधा हमला करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे, और यही उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई।
युद्ध का संक्षिप्त तांडव
उधर, ब्रिटिश नौसेना और सेना पूरी तरह से आक्रामक रुख अपना चुकी थी। रियर-एडमिरल हैरी रॉसन के नेतृत्व में ब्रिटिश युद्धपोत पहले ही जांजीबार के बंदरगाह पर तैनात कर दिए गए थे। अंग्रेजों ने खालिद को अंतिम मौका देते हुए 27 अगस्त 1896 की सुबह 9 बजे तक आत्मसमर्पण करने का समय दिया था। जब सुबह 9 बजे तक भी सुल्तान की ओर से कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला, तो ठीक 9:02 बजे ब्रिटिश युद्धपोतों ने महल की ओर गोले दागने शुरू कर दिए। देखते ही देखते महल पूरी तरह आग की लपटों में घिर गया। जांजीबार की ओर से एकमात्र शाही नौका एचएचएस ग्लासगो ने जवाबी कार्रवाई की कोशिश की, लेकिन ब्रिटिश बेड़े ने उसे पलभर में ही समुद्र की गहराई में समा दिया। अंततः, सुबह 9:40 बजे महल पर लहरा रहा जांजीबार का झंडा गिरा दिया गया और युद्ध समाप्त होने की आधिकारिक घोषणा कर दी गई।
नुकसान का आंकलन
इस युद्ध में तबाही का मंजर केवल एकतरफा था। महल पर भीषण बमबारी के कारण जांजीबार के लगभग 500 सैनिक और नागरिक मारे गए या घायल हो गए। इसके विपरीत, शक्तिशाली ब्रिटिश बेड़े को न के बराबर नुकसान उठाना पड़ा। हैरान करने वाली बात यह है कि इस पूरी लड़ाई में एक भी ब्रिटिश सैनिक की जान नहीं गई। केवल एक ब्रिटिश नाविक गंभीर रूप से घायल हुआ था, जो बाद में उचित इलाज के बाद पूरी तरह स्वस्थ हो गया। युद्ध खत्म होने के बाद विद्रोही खालिद बिन बरगश ने किसी तरह भागकर जर्मन दूतावास में शरण ली और बाद में जर्मनी की सहायता से वहां से सुरक्षित निकल गया। ब्रिटेन ने अपनी पसंद के कठपुतली शासक हमुद बिन मोहम्मद को गद्दी पर बिठाया और इसी के साथ जांजीबार की बची-खुची स्वतंत्रता भी हमेशा के लिए समाप्त हो गई। इस तरह ब्रिटिश साम्राज्य ने न केवल अपना प्रभुत्व बनाए रखा, बल्कि भविष्य के लिए एक मिसाल भी कायम कर दी।
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