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3 घंटे पहले
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बर्फीली झीलों में कैद है तबाही का जल
नेपाल में आई हालिया विनाशकारी बाढ़ ने भारी कोहराम मचाया है। तिब्बत की सीमा के पास ग्लेशियर के फटने से आई जलप्रलय ने नेपाल के जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। इस आपदा में अब तक 160 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। बाढ़ के पानी ने घरों, पुलों और बहुमंजिला इमारतों को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया है। तबाही का आलम यह है कि फिलहाल यह आकलन कर पाना भी कठिन है कि नेपाल को कुल कितनी आर्थिक और ढांचागत क्षति हुई है। लेकिन इस विनाश के बीच एक और चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है, जो भविष्य के लिए और भी बड़े खतरे का संकेत दे रही है।
47 झीलों का खतरा और वैज्ञानिक चेतावनी
नेपाल की भौगोलिक स्थिति और जलवायु परिवर्तन के कारण कुल 47 ग्लेशियर झीलें अब 'टाइम बम' की तरह व्यवहार कर रही हैं। वैज्ञानिक भाषा में इन्हें संभावित रूप से खतरनाक ग्लेशियर झीलें यानी पोटेंशियली डेंजरस ग्लेशियल लेक्स (PDGLs) के रूप में चिन्हित किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये झीलें फटीं, तो बहुत कम समय में भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर पहाड़ों से मैदानी इलाकों की तरफ आएगा। इस घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF के नाम से जाना जाता है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) और नेपाल सरकार के ताजा आकलन में इन खतरों को गंभीरता से लिया गया है।
कहां और कितनी झीलें हैं स्थित?
इन 47 संवेदनशील झीलों का विवरण हैरान करने वाला है। इनमें से 21 झीलें पूरी तरह से नेपाल के भीतर स्थित हैं, जबकि 25 झीलें सीमा पार तिब्बत के ऊंचे इलाकों में मौजूद हैं। ये झीलें उन प्रमुख नदियों के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में स्थित हैं, जो बहकर नेपाल में प्रवेश करती हैं। यही कारण है कि यदि इनमें से किसी भी झील के प्राकृतिक बांध टूटते हैं, तो नीचे बसे हुए गांव, कस्बे और वहां मौजूद महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पलक झपकते ही नष्ट हो सकते हैं।
सबसे अधिक जोखिम वाली झीलें और तत्काल जरूरतें
आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारी और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) इन झीलों के तेजी से विस्तार को लेकर बेहद चिंतित हैं। कई झीलें ऐसी हैं जिनके किनारे मिट्टी, बर्फ और पत्थरों से बनी प्राकृतिक दीवारें हैं, जो किसी भी वक्त टूट सकती हैं। इन उच्च जोखिम वाली झीलों में लोअर बरुन (तल्लोपोखरी), थुलागी (डोना), लुमडिंग त्शो, होंगु-2/चामलांग साउथ, त्सो रोल्पा और इम्जा त्सो झील प्रमुख हैं। इन झीलों के जलस्तर को कम करने के लिए तत्काल तकनीकी हस्तक्षेप की मांग की जा रही है ताकि जोखिम को न्यूनतम किया जा सके। इन झीलों के नीचे स्थित पहाड़ी और मध्य-पहाड़ी जिलों में सड़क, बिजली की परियोजनाओं और पुलों का अस्तित्व हमेशा खतरे में बना रहता है।
किन इलाकों पर है सबसे ज्यादा संकट?
शोध के अनुसार, कोशी और बागमती बेसिन वाले इलाकों में कुल क्षेत्रीय जोखिम का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों में केंद्रित है। सबसे अधिक खतरे वाले जिलों में निम्नलिखित क्षेत्र शामिल हैं:
- सोलुखुम्बु (दूध कोशी और इमजा बेसिन)
- संखुवासभा (बरुण और अरुण नदी घाटियां)
- दोलखा (तामा कोशी घाटी और त्सो रोल्पा क्षेत्र)
- सिंधुपालचोक (भोटे कोशी और सुन कोशी घाटियां, जो सीमा-पार झीलों से सीधे प्रभावित हो सकती हैं)
इसके अलावा रामेछाप, काव्रेपलानचोक और रसुवा के निचले इलाकों में, विशेषकर त्रिशूली बेसिन के तट पर बसी बस्तियां भी इस संभावित खतरे की जद में हैं।
पश्चिमी और सुदूर-पश्चिमी नेपाल की स्थिति
पश्चिमी और सुदूर-पश्चिमी नेपाल के गंडकी और करनाली बेसिन में भी स्थिति सामान्य नहीं है। यहां की जलविद्युत परियोजनाओं और स्थानीय समुदायों पर भी बड़ा खतरा मंडरा रहा है। इनमें थुलागी झील से नीचे मार्स्यांगडी बेसिन, मनांग और लमजुंग जिले, बूढ़ी गंडकी के किनारे गोरखा, मुस्तांग और म्यागदी में काली गंडकी बेसिन के क्षेत्र और हुमला करनाली कॉरिडोर के दूर-दराज के इलाके शामिल हैं। विशेषज्ञों की चिंता इसलिए और अधिक बढ़ गई है क्योंकि ऐसी बाढ़ बहुत तेजी से नीचे आती है, जिससे स्थानीय निवासियों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचने के लिए बहुत कम समय मिल पाता है।
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