हिमाचल प्रदेश
एक घंटा पहले
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हिमाचल प्रदेश में सुक्खू सरकार भांग की खेती को कानूनी दायरे में लाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। शनिवार को मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सुक्खू की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में हिमाचल प्रदेश एनडीपीएस नियम, 1989 में संशोधन को हरी झंडी दी गई। इस फैसले के तहत चिकित्सा और वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए भांग की खेती की अनुमति दी जाएगी।
आर्थिक संकट से उबरने की उम्मीद
माना जा रहा है कि भांग की नियंत्रित खेती राज्य के वित्तीय संकट को कम करने में मददगार साबित हो सकती है। दावा किया जा रहा है कि इससे किसानों की आमदनी बढ़ेगी और प्रदेश की अर्थव्यवस्था को बूस्टर डोज मिलेगा। शुरुआती चरण में इस खेती से राज्य सरकार को 500 से 1000 करोड़ रुपये की आय होने का अनुमान है, और आगे चलकर यह आंकड़ा और ऊपर जा सकता है।
जियो टैगिंग और पॉली हाउस में खेती
भांग की नियंत्रित खेती जियो टैगिंग के साथ पॉली हाउस में भी की जा सकेगी, ताकि हर पौधे पर नजर रखी जा सके। भांग के डंठल, बीज और पत्तियों का इस्तेमाल निर्माण सामग्री, वस्त्र, फर्नीचर, ब्यूटी प्रोडक्ट्स और जैव ईंधन के उत्पादन में किया जा सकेगा।
निगरानी और लाइसेंस की व्यवस्था
खेती पर पूरी निगरानी रखने के लिए तीन बार प्रशिक्षण का प्रावधान रखा गया है। लाइसेंस कराधान एवं आबकारी विभाग के तहत जारी किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में राजस्व विभाग, पुलिस, आईटी तथा पर्यावरण विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और जलवायु परिवर्तन विभाग भी शामिल रहेंगे।
उल्लेखनीय है कि हिमाचल प्रदेश के मंडी और कुल्लू जिलों समेत कुछ अन्य इलाकों में भांग प्राकृतिक रूप से उगती है और नशा तस्करी के जरिए इसकी आपूर्ति होती रही है। कुल्लू में यह मलाणा क्रीम के नाम से भी मशहूर है।
किन राज्यों में पहले से मान्यता
उत्तराखंड के अलावा मध्य प्रदेश के कुछ जिलों में भी भांग की खेती को मान्यता मिली हुई है। उत्तराखंड ने 2018 में ही कानूनी खेती की शुरुआत कर दी थी। हालांकि लाइसेंस, बीज की उपलब्धता, प्रोसेसिंग यूनिट्स और बाजार की सीमाओं के चलते इस खेती को बहुत अधिक बढ़ावा नहीं मिल सका।
उत्तराखंड को भांग की खेती से शराब नीति की तुलना में कम आय होती है, हालांकि सरकार की ओर से आय के आंकड़े कभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।
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