मात्र 50 रुपये में बीज बनेंगे शक्तिशाली, बुवाई से पहले आजमाएं यह खास देसी नुस्खा छत्तीसगढ़ 2 महीने पहले 38
छत्तीसगढ़ के एक युवा किसान ने बीजोपचार का बेहद किफायती और असरदार देसी तरीका साझा किया है, जिससे फसल का उत्पादन बेहतर होता है और लागत में बड़ी कमी आती है।

खेती में लागत घटाने का नया फॉर्मूला

छत्तीसगढ़ में इस समय खरीफ के सीजन के लिए तैयारियां जोरों पर चल रही हैं। राज्य के किसान लगातार ऐसी तकनीकों की तलाश में हैं, जिससे कम खर्च में बंपर पैदावार प्राप्त की जा सके। इसी बीच, राज्य के एक प्रगतिशील युवा किसान लक्ष्मीकांत प्रधान ने बीजोपचार की एक ऐसी देसी तकनीक साझा की है, जिसकी चर्चा हर तरफ हो रही है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसकी 50 रुपये से भी कम की लागत है। यह विधि न केवल सस्ती है, बल्कि इसके परिणाम भी बेहद प्रभावी माने जा रहे हैं।

बीजोपचार क्यों है जरूरी

लक्ष्मीकांत प्रधान के अनुसार, किसी भी फसल की बुवाई से पहले बीजों को तैयार करना बेहद आवश्यक होता है। यदि बीज मजबूत होंगे, तो फसल की शुरुआती बढ़त भी शानदार होगी। पारंपरिक बीजोपचार की यह विधि बीजों की अंकुरण क्षमता में सुधार लाती है और उन्हें बीमारियों से लड़ने के लिए तैयार करती है। यह तरीका उन छोटे और मध्यम वर्गीय किसानों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बनकर उभरा है, जो महंगे रसायनों और कीटनाशकों का बोझ उठाने में असमर्थ हैं।

इस तरह तैयार करें उपचार मिश्रण

युवा किसान ने पूरी प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से समझाया है। इस विधि को अपनाने के लिए निम्नलिखित सामग्रियों की आवश्यकता होती है:

  • ताजा गौमूत्र की मात्रा 5 से 7 लीटर
  • 5 किलो ताजा गोबर।
  • आवश्यकतानुसार चूने का पानी और ब्रह्मास्त्र।
  • खेत की थोड़ी सी उपजाऊ और सजीव मिट्टी।

प्रक्रिया शुरू करने के लिए एक बाल्टी में ताजा गौमूत्र और गोबर को अच्छी तरह मिलाया जाता है। इसके बाद, इस मिश्रण को एक कपड़े की थैली में बांधकर बाल्टी में लटका दिया जाता है, जिससे पूरी रात में गोबर का सारा अर्क गौमूत्र में घुल-मिल जाए। दूसरी तरफ, एक अलग बर्तन में चूने का पानी तैयार किया जाता है। जब पानी पूरी तरह साफ होकर ऊपर आ जाए, तो समझें कि वह उपयोग के लिए बिल्कुल तैयार है।

मिट्टी का सही चुनाव और अंतिम लेप

इस देसी नुस्खे में मिट्टी का योगदान भी महत्वपूर्ण है। किसान को ऐसी जगह से मिट्टी लेनी चाहिए जहाँ छाया रहती हो और जहां खेती न होती हो। इस 'सजीव मिट्टी' को लगभग एक पाव की मात्रा में बीजों के साथ मिलाया जाता है। बीजोपचार के अंतिम चरण में गौमूत्र का घोल, गोबर का मिश्रण, चूने का पानी और ब्रह्मास्त्र को एक साथ मिलाकर बीजों पर अच्छी तरह लेप किया जाता है। इसके बाद बीजों को छांव में 20 से 25 मिनट तक सुखाया जाता है। सूखने के बाद ये बीज बुवाई के लिए तैयार हो जाते हैं।

फायदे जो बदल देंगे आपकी खेती

लक्ष्मीकांत प्रधान का दावा है कि इस देसी विधि के इस्तेमाल से बीजों का जर्मिनेशन यानी अंकुरण काफी तेज और मजबूत होता है। इसकी मदद से बीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। फसल के शुरुआती जीवन चक्र में ही यह विधि उसे कीटों और फफूंद जैसे खतरों से सुरक्षित रखने में मदद करती है। यही कारण है कि स्थानीय किसानों के बीच यह तकनीक बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रही है। कम लागत और अधिक लाभ के कारण, यह तरीका आधुनिक खेती के लिए एक सार्थक और टिकाऊ विकल्प साबित हो रहा है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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