वैभव सूर्यवंशी की उड़ान में समस्तीपुर के चंद्रदीप की अहम भूमिका, परिवार की डांट सहकर भी नहीं छोड़ा हाथ बिहार 2 घंटे पहले 2
क्रिकेट जगत में चमक रहे वैभव सूर्यवंशी के शुरुआती दिनों के साथी चंद्रदीप कुमार ने घर-परिवार की नाराजगी झेलते हुए भी उन्हें घंटों अभ्यास कराया और अकादमी तक पहुंचाया। आज वैभव की कामयाबी पर चंद्रदीप को एक पिता जैसा गर्व महसूस होता है।

क्रिकेट की दुनिया में तेज़ी से अपना नाम बना रहे वैभव सूर्यवंशी की कामयाबी के पीछे केवल उनकी प्रतिभा और परिवार का संघर्ष ही नहीं है, बल्कि कुछ ऐसे चेहरे भी हैं जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। उनकी सफलता की कहानी के पीछे छिपे किरदारों की तलाश में निकली पड़ताल के दौरान कई दिलचस्प पहलू सामने आए। ऐसा ही एक नाम है समस्तीपुर के चंद्रदीप कुमार का, जो वैभव के शुरुआती दौर से ही उनके साथ खड़े रहे।

चंद्रदीप एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता सब्ज़ी बेचकर घर का खर्च चलाते हैं। अपनी ज़िम्मेदारियों के बीच से समय निकालकर चंद्रदीप ने वैभव के सपनों को परवान चढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। दोनों की पुरानी तस्वीरें आज भी सोशल मीडिया पर अक्सर वायरल होती रहती हैं, जो उनके गहरे रिश्ते की गवाही देती हैं।

सुबह-शाम घर जाकर कराते थे अभ्यास, अकादमी भी ले जाते साथ

चंद्रदीप कुमार बताते हैं कि जब वैभव छोटे थे, तब वह नियमित रूप से उनके घर जाया करते थे। बैटिंग अभ्यास के दौरान वह घंटों गेंदबाजी करते रहते थे ताकि वैभव को ज़्यादा से ज़्यादा प्रैक्टिस मिल सके। इतना ही नहीं, उन्हें अकादमी ले जाना, मैच वाली जगहों तक पहुंचाना और अभ्यास के लिए वक्त निकालना भी चंद्रदीप की ही ज़िम्मेदारी थी।

उनके मुताबिक वैभव के साथ-साथ शाहरुख नाम के एक और युवक ने भी उनकी कामयाबी में अहम योगदान दिया। चंद्रदीप ने वैभव के बचपन को बहुत करीब से देखा है और उनकी मेहनत, अनुशासन तथा खेल के प्रति समर्पण को महसूस किया है। उनका कहना है कि साल 2017 के अक्टूबर-नवंबर महीने में ही उन्हें यह अहसास हो गया था कि यह बच्चा आगे चलकर कुछ बड़ा करने वाला है। वैभव के शॉट्स, उनका आत्मविश्वास और खेल के प्रति जुनून उन्हें बाकी बच्चों से अलग खड़ा करता था।

घरवालों की फटकार सही, फिर भी नहीं छोड़ा वैभव का साथ

चंद्रदीप बताते हैं कि वैभव को समय देने की वजह से उन्हें कई बार अपने परिवार की नाराज़गी का सामना करना पड़ा। उनके माता-पिता अक्सर कहते थे कि वह बिना किसी फायदे के अपना समय दूसरे बच्चे के पीछे क्यों लगा रहे हैं। इसके लिए उन्हें कई बार डांट भी सुननी पड़ी, मगर उन्होंने इसकी कभी परवाह नहीं की। उनका मानना था कि वैभव में कुछ अलग कर दिखाने की क्षमता है और उसे सही सहयोग ज़रूर मिलना चाहिए।

उनके अनुसार जब वैभव बल्लेबाज़ी करते थे, तब वह और उनके साथी लगातार गेंदबाजी कर उन्हें अभ्यास कराते रहते थे। आज जब वैभव देश और दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं, तो उन पुराने दिनों की मेहनत याद करके चंद्रदीप को गर्व होता है। वह कहते हैं कि उस वक्त इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि वैभव इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल करेंगे, लेकिन उनकी प्रतिभा साफ झलकती थी।

पुराने साथियों को नहीं भूले वैभव, घर लौटते ही की मुलाकात

वैभव सूर्यवंशी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि कामयाबी की बुलंदी पर पहुंचने के बाद भी उन्होंने अपने संघर्ष के दिनों के साथियों को नहीं भुलाया। हाल ही में जब वैभव अपने घर लौटे तो उन्होंने चंद्रदीप कुमार से मुलाकात की, उनका हालचाल पूछा और पुराने दिनों की यादें ताज़ा कीं।

चंद्रदीप कहते हैं कि वैभव की सफलता पर उन्हें उतना ही गर्व है, जितना किसी पिता को अपने बेटे की उपलब्धि पर होता है। उनके मुताबिक एक छोटे से गांव का लड़का जिस तरह आज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है, वह आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा है। वैभव की कहानी यह साबित करती है कि किसी खिलाड़ी की सफलता अकेले उसकी नहीं होती, बल्कि उसके पीछे परिवार, दोस्त और ऐसे कई अनजान चेहरे होते हैं जिनकी मेहनत और त्याग उस कामयाबी में बराबर के हिस्सेदार होते हैं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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