मध्य प्रदेश
एक घंटा पहले
5
विचारों
विंध्य पर्वत की श्रृंखलाओं पर बसा एक हरा-भरा और जैव विविधता से भरपूर खूबसूरत जंगल, जहां नदियां, पहाड़, गुफाएं और चट्टानें मौजूद हैं, वन्य प्राणियों की अद्भुत प्रजातियों के लिए जाना जाता है। प्रकृति के इस अनमोल तोहफे में हर कदम पर पर्यटकों को रोमांच का अनुभव होता है। इसी इलाके में किंग वल्चर की मौजूदगी इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है।
मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व
570000 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला यह जंगल मध्य प्रदेश के सबसे बड़े टाइगर रिजर्व के रूप में पहचाना जाता है। वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व सागर, दमोह और नरसिंहपुर जिलों की सीमाओं में फैला हुआ है। तीनों जिलों की जैव विविधता मिलकर यहां एक अनूठा संगम बनाती है, जिसके चलते बाघ, तेंदुआ और भारतीय भेड़िया के साथ-साथ कई प्रजातियों के वन्य जीव और पक्षी यहां अपना स्थायी आशियाना बनाए हुए हैं।
इस टाइगर रिजर्व में करीब 300 प्रजातियों के पक्षी यहां की सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में जैव विविधता अनुकूल होने की वजह से यहां गिद्धों का कुनबा भी लगातार बढ़ रहा है।
देश की 9 में से 7 प्रजातियां यहां मौजूद
देशभर में पाई जाने वाली गिद्धों की 9 प्रजातियों में से 7 इसी टाइगर रिजर्व में देखने को मिलती हैं। प्रकृति के सफाई कर्मी के रूप में मौजूद ये गिद्ध आसपास के मृत मवेशियों को खाकर फूड लाइन को संतुलित बनाए रखते हैं। इन्हीं गिद्धों में एक किंग वल्चर भी शामिल है, जो गंभीर रूप से विलुप्तप्राय श्रेणी में आता है।
इसके अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह हमेशा अकेला ही दिखाई देता है। लेकिन सागर के नौरादेही में आजकल यह दो और तीन की जोड़ियों में नजर आ रहा है। टाइगर रिजर्व में मौजूद वन कर्मियों ने अपने कैमरों से इन्हें तस्वीरों में कैद किया है।
राजा जैसी पहचान वाला गिद्ध
टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर डॉक्टर रजनीश सिंह बताते हैं कि किंग वल्चर काले रंग का होता है। इसकी गर्दन से लेकर ऊपरी हिस्सा पूरी तरह से चिकन और पिंक लाल रंग का होता है। ऐसे में जब यह किसी पेड़ या अन्य जगहों पर बैठता है तो बहुत दूर से ही आसानी से देखा जा सकता है और किसी राजा की तरह प्रतीत होता है, जिससे इसे पहचानना आसान हो जाता है।
10000 फीट की ऊंचाई से खोज लेता है भोजन
डॉक्टर सिंह के अनुसार, इस राजगिद्ध की खासियत यह है कि यह बिना पंख फड़फड़ाए बहुत देर तक आसमान में उड़ सकता है। यह क्षमता उसने लाखों वर्षों की मेहनत से अपनाई है। यह 8000 फीट की ऊंचाई तक उड़ान भरता है और इतनी ही ऊंचाई से अपने आसपास की परिधि में भोजन की तलाश आसानी से कर लेता है। इसे एशियन किंग वल्चर के नाम से भी जाना जाता है।
बुंदेलखंड क्षेत्र में यह एक-एक या दो की संख्या में दिखाई देता है, जबकि दूसरी प्रजाति के गिद्ध 30 से 40 के झुंड में नजर आते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक इसकी जोड़ियों में मौजूदगी इस क्षेत्र के लिए बेहद सुखद खबर है।
Comments
0 comment