मांसाहार की बढ़ती दीवानगी ने खड़ा किया नया खतरा, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने चौंकाया विश्व एक घंटा पहले 3
एफएओ की नई रिपोर्ट बताती है कि बीते 60 सालों में प्रति व्यक्ति मांस की सालाना खपत 25 किलो से बढ़कर 47 किलो पहुंच गई है, और इस बढ़ती मांग से पर्यावरण पर गंभीर संकट मंडरा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र (UN) के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की एक ताज़ा रिपोर्ट में बताया गया है कि बीते 60 सालों में दुनिया भर के लोगों ने बड़े पैमाने पर शाकाहार छोड़कर मांसाहार को अपना लिया है। इसी का नतीजा है कि प्रति व्यक्ति मांस की सालाना खपत 25 किलो से बढ़कर सीधे 47 किलो तक पहुंच गई है। रिपोर्ट के अनुसार, साल 1961 की तुलना में चिकन खाने की आदत में रिकॉर्ड 6 गुना का उछाल देखा गया है, लेकिन खान-पान का यही बदलता मिज़ाज धरती के लिए पर्यावरण का एक बड़ा संकट बनकर उभरा है।

चिकन-मटन की खपत से बढ़ा प्रदूषण

शौक से चिकन और मटन खाने वाले लोगों की वजह से दुनिया के सामने एक नई मुश्किल खड़ी हो गई है, जिस पर खुद संयुक्त राष्ट्र ने रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में कई चिंताजनक तथ्य सामने आए हैं। बताया जा रहा है कि पिछले 60 सालों में दुनिया भर की खान-पान की आदतें पूरी तरह बदल चुकी हैं। लोग अब साग-सब्ज़ी और शाकाहार से दूर होकर तेज़ी से मांसाहार की ओर बढ़ रहे हैं।

एफएओ की इस रिपोर्ट ने दुनिया के नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों को सतर्क कर दिया है। रिपोर्ट कहती है कि जैसे-जैसे थाली में मांस का हिस्सा बढ़ रहा है, वैसे-वैसे धरती पर प्रदूषण, ज़हरीली गैसों और ग्लोबल वॉर्मिंग का खतरा भी खतरनाक स्तर तक पहुंच रहा है।

25 किलो से सीधे 47 किलो पर पहुंची खपत

रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े वाकई चौंकाने वाले हैं। साल 1961 में दुनिया में प्रति व्यक्ति सालाना मांस की औसत सप्लाई महज़ 25 किलोग्राम हुआ करती थी, लेकिन साल 2022 तक यह आंकड़ा लगभग दोगुना बढ़कर 47 किलोग्राम प्रति व्यक्ति सालाना पर पहुंच गया। यानी हर साल लाखों टन मांस की खपत हो रही है।

चिकन ने तोड़े सारे रिकॉर्ड

साल 1961 में एक व्यक्ति सालभर में औसतन 3 किलो से भी कम चिकन खाता था, लेकिन साल 2022 में यही आंकड़ा बढ़कर 17 किलोग्राम तक पहुंच गया। इसका मतलब है कि चिकन की खपत में करीब 6 गुना का ऐतिहासिक उछाल आया है। आज छोटी गलियों के ढाबों से लेकर बड़े रेस्टोरेंट तक, हर जगह चिकन की मांग सबसे ज़्यादा है।

पोर्क और बीफ की स्थिति

इस दौरान पोर्क खाने की आदत भी दोगुनी हो गई है और यह अब 15 किलो प्रति व्यक्ति तक पहुंच गई है। हालांकि, बीफ की खपत में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखा और यह दुनिया भर में करीब 9 किलोग्राम पर स्थिर बनी हुई है।

मांस की मांग क्यों बढ़ी?

विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे असली वजह पैसा और बदलती जीवनशैली है। जिन देशों में लोगों की आमदनी बढ़ रही है और शहरीकरण तेज़ी से फैल रहा है, वहां रहन-सहन और खान-पान का तरीका पूरी तरह बदल चुका है। लोग अब पारंपरिक दाल-चावल और हरी सब्ज़ियों के बजाय मांस को स्टेटस सिंबल और अपनी रोज़मर्रा की डाइट का अहम हिस्सा बना रहे हैं। इस स्वाद की जो कीमत धरती को चुकानी पड़ रही है, वह बेहद गंभीर है।

आसमान छूता प्रदूषण

मौजूदा दौर में दुनिया भर में होने वाले कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कृषि और पशुपालन दूसरा सबसे बड़ा कारण बनकर उभरा है। फैक्ट्रियों और गाड़ियों के बाद यही क्षेत्र सबसे ज़्यादा प्रदूषण फैला रहा है।

पर्यावरण में गर्मी बढ़ाने वाली और ओज़ोन परत को नुकसान पहुंचाने वाली गैसों में अकेले पशुपालन का हिस्सा 12% से लेकर 20% तक है। आशंका जताई जा रही है कि अगले दशक में इस क्षेत्र से होने वाला प्रदूषण 7.6% तक और बढ़ सकता है, जिसका 80% कारण सिर्फ पशुपालन होगा।

अमीर और गरीब देशों के बीच गहरी खाई

रिपोर्ट में एक और कड़वा सच सामने आया है कि अमीर और गरीब देशों के बीच खान-पान को लेकर कितना बड़ा अंतर मौजूद है। अमीर देशों में लोग अपनी हैसियत के दम पर खूब मांस खा रहे हैं और वहां मांस की सप्लाई बहुत ज़्यादा और स्थिर बनी हुई है। दूसरी ओर, कई गरीब और कम आय वाले देशों में आज भी भुखमरी का माहौल है, जहां पौष्टिक भोजन और दूध तो दूर, दो वक्त की रोटी जुटाना भी बड़ी चुनौती है।

एफएओ के नरम रुख पर भड़के वैज्ञानिक

हैरानी की बात यह है कि पर्यावरण पर मंडरा रहे इतने बड़े खतरे के बावजूद एफएओ ने अमीर देशों को मांस की खपत घटाने की कोई सीधी या सख्त सलाह नहीं दी। इसके बजाय संगठन ने बेहद नरम रुख अपनाते हुए सिर्फ इतना कहा कि खेती के तरीकों को बेहतर बनाया जाए, खाने की बर्बादी रोकी जाए और नई तकनीक के ज़रिए पशुपालन से होने वाले प्रदूषण को कम किया जाए।

इस ढुलमुल रवैए ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों को नाराज़ कर दिया है और वे इसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का साफ कहना है कि अगर अमीर देश मांस खाना थोड़ा कम कर दें और प्लांट-बेस्ड डाइट की ओर लौटें, तो क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वॉर्मिंग के इस बड़े खतरे को आसानी से और जल्दी टाला जा सकता है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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