तीज पर घेवर को कड़ी टक्कर देती है करौली की खास मिठाई तिल चामड़ी, स्वाद ऐसा कि भूल नहीं पाएंगे जीवनशैली एक घंटा पहले 3
राजस्थान के करौली में तीज और रक्षाबंधन के मौके पर 'तिल चामड़ी' नाम की एक अनूठी मिठाई की धूम रहती है। स्वाद में लाजवाब और लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाली यह मिठाई घेवर को भी कड़ी टक्कर देती है।

राजस्थान के करौली की अनूठी पहचान है तिल चामड़ी

राजस्थान में सावन का महीना आते ही त्योहारों की रौनक बढ़ जाती है और इसमें तीज का विशेष स्थान है। तीज के मौके पर जब भी मिठाइयों का जिक्र आता है तो सबसे पहला नाम घेवर का लिया जाता है। हालांकि, राजस्थान के करौली जिले में एक ऐसी पारंपरिक मिठाई भी है जो घेवर की लोकप्रियता को कड़ी टक्कर देती है। इस मिठाई का नाम तिल चामड़ी है। स्थानीय लोगों का तो यहां तक दावा है कि यह खास मिठाई दुनिया में केवल करौली में ही बनाई जाती है और इसका स्वाद किसी को भी मंत्रमुग्ध कर सकता है।

कई पीढ़ियों से बरकरार है स्वाद और परंपरा

तिल चामड़ी की खासियत यह है कि इसे तैयार करने का हुनर कई पीढ़ियों से एक खास मुस्लिम परिवार के पास सुरक्षित है। कमर खान, जो लंबे समय से इस व्यवसाय से जुड़े हैं, बताते हैं कि तीज और रक्षाबंधन के समय इस मिठाई की मांग काफी अधिक बढ़ जाती है। करौली शहर के साथ साथ आसपास के ग्रामीण इलाकों से भी लोग इस विशेष मिठाई को खरीदने के लिए खींचे चले आते हैं। इसे बनाने की प्रक्रिया बेहद मेहनत भरी है और इसमें विशेष अनुभव की आवश्यकता होती है। अच्छी गुणवत्ता वाले तिल का चयन करने के बाद उस पर एक खास विधि से तैयार की गई चाशनी की परत चढ़ाई जाती है, जिससे इसका स्वाद बेजोड़ हो जाता है।

क्यों खास है तिल चामड़ी की शेल्फ लाइफ?

इस मिठाई की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण इसकी लंबी शेल्फ लाइफ यानी लंबे समय तक खराब न होना है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, यदि इस मिठाई को उचित तरीके से सुरक्षित रखा जाए, तो यह करीब एक महीने तक बिल्कुल ताजा बनी रहती है। यही कारण है कि करौली के लोग इसे अपने दूर-दराज रहने वाले रिश्तेदारों और परिवार के सदस्यों के लिए सोगी के रूप में उपहार स्वरूप भेजते हैं। रक्षाबंधन और तीज जैसे त्योहारों पर बेटियों को दी जाने वाली सोगियों में तिल चामड़ी को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाता है।

तीज से राखी तक का होता है खास कारोबार

बाजार में तिल चामड़ी की उपलब्धता सीमित समय के लिए ही होती है। आमतौर पर यह मिठाई तीज से लेकर रक्षाबंधन तक के करीब 15 से 20 दिनों की अवधि में ही मिलती है। स्थानीय निवासी राजेंद्र गुप्ता का कहना है कि तिल चामड़ी करौली की एक सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। तीज के अवसर पर हिंदू परिवारों में इस मिठाई की मांग बहुत अधिक रहती है क्योंकि यह पारंपरिक त्योहारों की मिठास और आपसी जुड़ाव का प्रतीक मानी जाती है।

कैसे तैयार होती है यह अनोखी मिठाई?

तिल चामड़ी को बनाने की विधि सरल नहीं है। सबसे पहले चाशनी को बिल्कुल सटीक तापमान और विधि से तैयार किया जाता है। इसके बाद, उच्च गुणवत्ता वाले तिलों पर इस चाशनी की बारीक और एकसमान परत चढ़ाई जाती है। पूरी प्रक्रिया में कारीगरों के कौशल और धैर्य की परीक्षा होती है। पीढ़ियों से इस काम को कर रहे परिवारों ने इस पारंपरिक रेसिपी को आज भी उसी शुद्धता के साथ संभाल कर रखा है, जिसके कारण इसका स्वाद दशकों बाद भी वैसा ही बना हुआ है। यदि आप करौली के आसपास हैं, तो तीज के इस सीजन में इस अनूठी मिठाई का स्वाद लेना न भूलें, क्योंकि एक बार चखने के बाद इसका स्वाद भूल पाना वाकई मुश्किल है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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