रांची की महिलाओं की बदली तकदीर, मड़वा की नर्सरी से हर महीने कमा रहीं ₹25000 झारखंड 2 महीने पहले 70
रांची के मुरकुनी गांव की महिलाएं अब फुर्सत के समय में बातें करने के बजाय मड़वा बीज की नर्सरी चलाकर आत्मनिर्भर बन रही हैं। गोमूत्र तकनीक से तैयार पौधों की मांग झारखंड के बाहर भी है, जिससे हर महिला को हर महीने अच्छी कमाई हो रही है।

बदलाव की एक अनूठी कहानी

झारखंड की राजधानी रांची के पास स्थित मुरकुनी गांव आज चर्चा का विषय बना हुआ है। कभी गांव की महिलाएं अपना खाली समय एक साथ बैठकर गपशप करने या इधर-उधर की बातें करने में बिताती थीं, लेकिन अब उन्होंने अपनी जिंदगी और आर्थिक स्थिति को पूरी तरह बदल लिया है। इन महिलाओं ने मड़वा बीज की नर्सरी का काम शुरू किया है और आज वे संगठित होकर हर महीने ₹25000 तक की कमाई कर रही हैं।

खाली समय का सदुपयोग

गांव की महिलाओं का कहना है कि पहले शाम के समय करीब 8 से 10 महिलाएं एक साथ बैठकर केवल चुगली करती थीं, जिससे कोई लाभ नहीं होता था। हालांकि, किसी ने उन्हें मड़वा बीज की नर्सरी शुरू करने का सुझाव दिया, जिसे सभी ने गंभीरता से लिया। आज स्थिति यह है कि जब भी ये महिलाएं एक साथ बैठती हैं, तो उनका पूरा ध्यान मड़वा के पौधे तैयार करने के काम पर होता है। सभी ने अपनी जमीनों को एक साथ जोड़ लिया है और एक टीम की तरह मिलकर काम कर रही हैं।

झारखंड से बाहर भी मांग

मुरकुनी गांव की महिलाओं द्वारा तैयार किए गए पौधों की मांग केवल झारखंड के विभिन्न जिलों तक ही सीमित नहीं है। उनकी मेहनत और गुणवत्ता की बदौलत व्यापारी आकर उनसे ये पौधे खरीदते हैं और उन्हें राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी भेजते हैं। इस बड़े बाजार ने महिलाओं की कमाई का जरिया मजबूत कर दिया है। आज हर महिला महीने में 20 से 25 हजार रुपये कमा रही है और सामूहिक रूप से यह आय लाखों में पहुंच गई है।

पौधे तैयार करने की विशेष तकनीक

सरिता बताती हैं कि वे पौधों को एक विशेष वैज्ञानिक विधि से तैयार करती हैं, जिससे फसल की पैदावार अधिक होती है। प्रक्रिया के चरण इस प्रकार हैं:

  • सबसे पहले मड़वा का बीज लिया जाता है।
  • बीज में गोमूत्र मिलाकर उसे अच्छी तरह उपचारित किया जाता है।
  • गोमूत्र में मिलाने के बाद इसे 2 घंटे तक सुखाया जाता है।
  • इसके बाद इसमें बालू मिलाया जाता है।
  • फिर इस मिश्रण को क्यारियों में बहुत सावधानी और सीमित मात्रा में डाला जाता है।
  • इस तकनीक के इस्तेमाल से मात्र 30 दिनों में पौधा रोपाई के लिए तैयार हो जाता है।

गोमूत्र के उपयोग का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे पौधों की जड़ें बेहद मजबूत और मोटी होती हैं। जब ये पौधे बड़े होते हैं, तो अन्य पारंपरिक तरीकों के मुकाबले मड़वा की मात्रा कहीं ज्यादा प्राप्त होती है।

आत्मनिर्भरता की ओर कदम

काम का विभाजन बहुत स्पष्ट है। कुछ महिलाएं बीज बोने का काम देखती हैं, कुछ पौधे तैयार करने की प्रक्रिया संभालती हैं, तो कुछ खरपतवार हटाने का जिम्मा उठाती हैं। सब मिलकर काम करने के कारण काम आसान हो जाता है। आज इन महिलाओं के जीवन में खुशहाली आई है। कई महिलाओं ने खुद के लिए स्मार्टफोन खरीदे हैं और अब वे अपनी स्कूटी से भी चलती हैं। गांव की दूसरी महिलाएं भी उन्हें काम करते देख प्रेरित हो रही हैं और उनसे खेती की यह तकनीक सीखने की इच्छा जता रही हैं। चुगली करने वाला खाली समय अब आर्थिक तरक्की के नए रास्ते खोल रहा है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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