नमक-रोटी से अमेरिका तक का सफर: रांची की ललिता देवी ने जूट बैग और सोहराई पेंटिंग से लिखी कामयाबी की नई कहानी, हर महीने लाखों की कमाई झारखंड एक घंटा पहले 2
रांची की ललिता देवी कभी नमक-रोटी के लिए भी मोहताज थीं, लेकिन हाथ से बनाए जूट बैग और सोहराई पेंटिंग ने उनकी जिंदगी बदल दी। आज उनके ग्राहक देशभर में फैले हैं और वे महीने में लाखों रुपये की कमाई करती हैं।

झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली ललिता देवी की कहानी हर उस इंसान के लिए मिसाल है, जो मुश्किल हालात में भी हार मानने से इनकार कर देता है। एक वक्त था जब उनके घर में नमक-रोटी तक का इंतजाम मुश्किल से होता था, और आज वे अपने हुनर के दम पर हर महीने लाखों रुपये कमा रही हैं। ललिता देवी ट्राइब्स इंडिया से जुड़ी हुई हैं और उन्हें झारक्राफ्ट से भी मदद मिलती है।

हाथ से तैयार होता है हर सामान

ललिता देवी बताती हैं कि वे जूट के बैग बनाती हैं और इसके साथ ही पर्स, घड़ी और घर सजाने के तमाम सामान भी तैयार करती हैं। इसके अलावा वे हाथ से सोहराई पेंटिंग भी करती हैं। उनके यहां किसी भी काम में मशीन का इस्तेमाल नहीं होता, हर चीज पूरी तरह हाथ से ही बनाई जाती है।

वे लकड़ी की घड़ी, लकड़ी का पेन स्टैंड और घर की सजावट का सारा सामान खुद अपने हाथों से काटकर बनाती हैं। ऑफिस में इस्तेमाल होने वाली फाइलें भी वे तैयार करती हैं, जिन पर खूबसूरत सोहराई पेंटिंग बनी होती है।

पेंटिंग में झलकती है झारखंड की संस्कृति

ललिता की पेंटिंग में झारखंड की संस्कृति की झलक साफ दिखाई देती है। इनमें कहीं महिलाएं सिर पर टोकरी रखकर जंगल की ओर जाती दिखती हैं, तो कहीं घर में खाना पकाती नजर आती हैं। कुछ पेंटिंग में सभी लोग एक साथ आदिवासी नृत्य करते हुए दिखाए जाते हैं। इस तरह वे अपनी कला के जरिए झारखंड की संस्कृति को सामने लाने की कोशिश करती हैं।

समय-समय पर मिलती है ट्रेनिंग

ललिता को इन सभी कामों की समय-समय पर ट्रेनिंग दी जाती है। सामान को और अधिक खूबसूरत व फिनिश्ड कैसे बनाया जाए और किन नई चीजों पर काम किया जा सकता है, इसकी जानकारी उन्हें लगातार मिलती रहती है।

मुंबई से चेन्नई तक फैले ग्राहक

आज ललिता के ग्राहक मुंबई से लेकर चेन्नई तक फैले हुए हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि सरकार उन्हें इन शहरों में मुफ्त स्टॉल लगाने के लिए भेजती है। दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों में वे हर दूसरे-तीसरे महीने जाती हैं, जहां सरकार की ओर से उन्हें स्टॉल लगाने का मौका मिलता है।

वे बताती हैं कि आज उनकी कमाई इतनी है कि वे आराम से अमेरिका तक घूम आई हैं। महीने में लाख रुपये तो आराम से जमा रहते हैं और किसी तरह की कोई टेंशन नहीं है। उन्हें खुद भी यकीन नहीं था कि इतना सबकुछ मिल जाएगा, लेकिन अपने दम पर कुछ कर दिखाने की हिम्मत और हौसले ने यह मुकाम दिलाया।

बदल गई थाली, मिला सम्मान

ललिता बताती हैं कि आज वे पनीर और अच्छा खाना खाती हैं। दोपहर के खाने की थाली में दो रंग की सब्जी जरूर होती है। जबकि एक वक्त ऐसा भी था जब नमक-रोटी के भी लाले पड़े रहते थे और समझ नहीं आता था कि आज खाएं तो कल कहां से लाएंगे।

इस बदलाव के साथ उन्हें घर में महिला होने के नाते भरपूर सम्मान भी मिलने लगा है। वे कहती हैं कि अब लोग उनकी बात सुनते हैं और कुछ भी कहने से पहले चार बार सोचते हैं।

चेतन शुक्ला
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चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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