रांची: इटकी के किसानों का अनोखा देसी जुगाड़, एक सुरंग से हो जाती है 10 एकड़ खेत की ऑटोमेटिक सिंचाई झारखंड एक घंटा पहले 3
झारखंड की राजधानी रांची के इटकी इलाके में किसान खेती के लिए बेहद सरल और प्रभावी तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे बिना किसी मेहनत के कई एकड़ खेतों में अपने आप पानी पहुंच जाता है।

खेती में तकनीक और मेहनत का बेहतरीन मेल

झारखंड की राजधानी रांची के इटकी इलाके में रहने वाले किसानों ने सिंचाई की एक ऐसी अनोखी विधि विकसित की है, जो न केवल उनका समय बचाती है बल्कि फसल की सिंचाई को बेहद आसान बना देती है। सामान्य तौर पर धान की खेती के लिए पानी की भारी खपत होती है, लेकिन यहां के किसानों ने अपने खेतों को इस तरह से तैयार किया है कि उन्हें बार-बार पाइप बदलने या खेत-खेत जाकर पानी देखने की कोई चिंता नहीं सताती। यहाँ के प्रत्येक किसान के पास लगभग 5 एकड़ भूमि है और वे सिंचाई के लिए एक विशेष प्रकार के स्टेप मॉडल का उपयोग करते हैं।

कैसे काम करती है यह सुरंग प्रणाली

इस अनूठी सिंचाई व्यवस्था के बारे में जानकारी देते हुए स्थानीय किसान किशन चौधरी ने बताया कि उन्होंने अपने खेतों को सीढ़ीनुमा आकार में व्यवस्थित किया है। जब किसान कुएं से पहले खेत में पानी छोड़ते हैं, तो वह खेत पूरी तरह भर जाने के बाद वहां बने एक विशेष सुरंग के माध्यम से दूसरे खेत में चला जाता है। यह प्रक्रिया इसी तरह आगे बढ़ती है और पानी दूसरे खेत से तीसरे में और फिर चौथे खेत तक स्वतः पहुंच जाता है। इस तकनीक के कारण किसानों को खेतों में जाकर पानी की निगरानी करने की जरूरत नहीं पड़ती है। इससे पाइप लगाने की झंझट भी खत्म हो गई है और फसलें बिना किसी अतिरिक्त मेहनत के लहलहा उठती हैं।

पानी का प्रबंधन और संतुलन

किसान किशन चौधरी ने आगे समझाया कि इस विधि से खेतों में पानी का स्तर हमेशा संतुलित बना रहता है। यह तकनीक इस तरह से डिजाइन की गई है कि खेत में पानी का जमाव जरूरत से ज्यादा नहीं होता है। यदि पानी की मात्रा एक खेत की क्षमता से अधिक होती है, तो वह अतिरिक्त पानी तुरंत तीन-चार सुरंगों के जरिए अगले खेत में स्थानांतरित हो जाता है। इस प्रकार, पानी अंत में सबसे निचले खेत तक पहुंच जाता है, जहां से यह एक नाले के माध्यम से बाहर निकल जाता है। इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा लाभ यह है कि पानी न तो व्यर्थ बहता है और न ही खेतों में इसकी कमी होती है।

12 घंटे चलती है ऑटोमेटिक प्रक्रिया

यह पूरी सिंचाई प्रणाली लगभग 12 घंटे तक लगातार चलती रहती है। चूंकि पानी का बहाव ऊपर से नीचे की ओर होता है, इसलिए सिंचाई के लिए किसी पंप या अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता नहीं पड़ती। सुरंग बनाने की तकनीक के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि खेतों की मेड (मेड़) में सुरंग को इस तरह से बनाया जाता है कि वह अगले खेत के निचले हिस्से में जाकर खुले। यह सुनिश्चित करता है कि पानी का फोर्स (दबाव) हमेशा सही बना रहे। केवल 1 मिनट के अंतराल में किसान तीन सुरंगें तैयार कर देते हैं, जो पानी के प्रवाह को सुगम बनाती हैं।

10 एकड़ खेतों में प्रभावी असर

इस देसी जुगाड़ की मदद से इटकी के किसान सफलतापूर्वक 10 एकड़ भूमि की सिंचाई कर रहे हैं। धान की रोपाई के मौजूदा समय में, जब पानी की जरूरत सबसे ज्यादा होती है, यह तकनीक किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। बिना किसी महंगे उपकरणों या जटिल मशीनरी के, केवल प्रकृति के ढलान और सूझबूझ से सिंचाई की यह समस्या हल कर ली गई है। यह नवाचार न केवल खेती की लागत को कम करता है, बल्कि कम पानी में बेहतर फसल सुनिश्चित करने का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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