रजत शर्मा का ब्लॉग: परिसीमन और संसद की बदली तस्वीर, क्या मोदी पूरा कर पाएंगे अपना लक्ष्य? भारत एक घंटा पहले 3
संसद के मानसून सत्र के अंतिम दिनों में परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे बड़े विधेयकों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीति और नए संसद भवन की तैयारियों के बीच देश की राजनीतिक दिशा पर एक विश्लेषण।

संसद में बड़ी हलचल के संकेत

संसद का मानसून सत्र अब अपने निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुका है और अंतिम चार दिन बेहद अहम माने जा रहे हैं। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी दल कांग्रेस, दोनों ने ही अपने सांसदों के लिए व्हिप जारी कर दिया है ताकि सदन में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके। एनडीए के सहयोगी दलों को भी स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि सत्र के इन आखिरी चार दिनों में कोई भी सदस्य सदन से अनुपस्थित न रहे। राजनीतिक गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि सरकार परिसीमन विधेयक, महिला आरक्षण विधेयक और एफसीआरए (FCRA) विधेयक जैसे महत्वपूर्ण मसौदे सदन में पेश कर सकती है। दूसरी ओर, राहुल गांधी ने साफ कर दिया है कि इन विधेयकों को किसी भी स्थिति में पारित नहीं होने दिया जाएगा।

गणित और जोड़-तोड़ की राजनीति

पिछली बार जब सरकार ने परिसीमन विधेयक को लोकसभा में पेश करने का प्रयास किया था, तब उसे आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया था। उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कहा था कि यह कानून देश के व्यापक हित में है और महिलाओं को संसद में एक तिहाई प्रतिनिधित्व देने के लिए अनिवार्य है। तब से ही सरकार इस लक्ष्य को पाने के लिए लगातार प्रयासरत है। इस दौरान तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना जैसे दलों में विभाजन हुआ, जिससे संख्या बल में फेरबदल हुआ। राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए डीएमके और कांग्रेस के बीच बनी दूरियों को भुनाने की कोशिश की जा रही है। अब खबरें हैं कि डीएमके के साथ परिसीमन विधेयक को लेकर बातचीत चल रही है, जबकि शरद पवार की एनसीपी, वाईएसआर कांग्रेस और अकाली दल से भी समर्थन मिलने की प्रबल संभावनाएं हैं।

सीटों की संख्या और 816 का आंकड़ा

यदि इतनी भारी मशक्कत और राजनीतिक गुणा-गणित किया गया है, तो इसके पीछे का उद्देश्य परिसीमन विधेयक को पारित कराना ही है। यह समय की मांग है कि संसद में महिलाओं को एक तिहाई सीटें मिलें, और इसका सबसे कारगर तरीका कुल सीटों की संख्या बढ़ाकर 816 करना है। यह विस्तार तभी संभव है जब नया परिसीमन कानून लागू हो। इसलिए, ये दोनों विषय आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। वर्तमान में विपक्षी खेमे में पहले जैसी एकजुटता नहीं दिख रही है। अरविंद केजरीवाल और राहुल गांधी के बीच का टकराव हो, डीएमके द्वारा राहुल गांधी पर धोखे का आरोप लगाना हो, या शरद पवार की अनिश्चित स्थिति, सरकार इसका भरपूर फायदा उठाने की कोशिश कर रही है।

भविष्य की दूरदर्शी सोच

प्रधानमंत्री मोदी सही अवसर की प्रतीक्षा में हैं। जैसे ही अनुकूल स्थिति बनेगी, वे परिसीमन का दांव चलेंगे और संसद में सदस्यों की संख्या बढ़ाएंगे। इस विजन को उन्होंने उसी समय धरातल पर उतारने का फैसला ले लिया था जब नए संसद भवन का निर्माण हुआ था, जिसमें 1000 सदस्यों के बैठने की क्षमता है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि नरेंद्र मोदी की रणनीतियां कितनी दीर्घकालिक और दूरदर्शी होती हैं।

हैंडलूम और स्वदेशी का सम्मान

हैंडलूम दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से आह्वान किया कि वे खादी और स्वदेशी उत्पादों को अपनाएं। उन्होंने जोर दिया कि हैंडलूम केवल हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं, बल्कि करोड़ों बुनकरों की जीविका का आधार भी है। खादी से बनी वस्तुओं को खरीदने का अर्थ है गरीब परिवारों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार देना। बनारसी साड़ी हो, पंजाब की फुलकारी हो या तमिलनाडु की कांजीवरम, ये हमारी सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक हैं। वोकल फॉर लोकल अभियान ने मध्य प्रदेश की चंदेरी, असम की मूगा रेशम और राजस्थान की कोटा डोरिया जैसे उत्पादों को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाई है। हालांकि, मार्केटिंग, डिजाइन और पैकेजिंग में सुधार की अभी भी आवश्यकता है ताकि भारतीय उत्पाद विश्व बाजार में अपनी गुणवत्ता के अनुरूप बड़ा हिस्सा हासिल कर सकें।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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